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Tuesday, February 5, 2013

’कथादेश’ की मौजूदा बहस और उद्भ्रांत



प्रिय मित्रों,
 आपको स्मरण होगा कि गत वर्ष ‘कथादेश’ के मई, 2012 अंक में प्रकाशित, दो पूर्ण कविताओं के संदर्भ में सुश्री शालिनी माथुर के लेख पर मेरी पहली स्वतःस्फुट टू दी प्वाइंट टिप्पणी को पत्रिका के संपादक ने आश्वासन देकर भी जुलाई अंक में नहीं दिया और अगस्त, 2012 के अंक में पूरे कारटेल के चार विस्तृत आलेखों के साथ उसे पर्याप्त संक्षिप्त कर उसे प्रकाशित किया था। यह बहस बहुत गलत तरीके से अर्चना वर्मा द्वारा कविताओं की पैरवी करते हुए आगे बढ़ाई गई थी और दिसम्बर, 2012 के अंक में उन्होंने अपने ही स्तर पर 11 पृष्ठीय लेख में उसके समाप्त होने की अनुचित घोषणा भी कर दी थी, क्योंकि बहस की समाप्ति हमेशा बहस प्रारम्भ करने वाले के द्वारा ही की जाती है। इसलिए 19 जनवरी, 2013 को पत्रिका के संपादक हरिनारायण से अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए मैंने अपनी प्रतिक्रिया भेजने की इच्छा जाहिर की थी।

 उनकी सहमति मिलने पर ‘गडबड़झाला’ शीर्षक से संलग्न टिप्पणी कोरियर से भेज दी थी जो उन्होंने 21 जनवरी को प्राप्त हो गई थी। टिप्पणी में मैंने सुश्री वर्मा की समूची नकारात्मक भूमिका पर सवाल उठाये थे और पॉर्न कविताओं के पक्ष में लेख लिखाने के षड्यंत्र का खुलासा किया था। पत्रिका का अंक महीने की 25 तारीख तक फाइनल होता है। लेकिन अभी संजीव चंदन ने टेलीफोन से बताया कि अर्चना वर्मा ने उन्हें यह सूचित किया कि मेरी टिप्पणी ‘कथादेश’ में पाठकों के पत्र वाले कॉलम में भी नहीं छापी गई है उन्हें अंदेशा रहा होगा कि मेरी टिप्पणी छपने से वे और उनका समूचा कारटेल बेनकाब हो जाएगा।

 मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप अपने-अपने ब्लॉग में इस टिप्पणी को अविलम्ब जारी करने की कृपा करें ताकि ‘कथादेश’ के फरवरी, 2013 के अंक के बाजार में आने के साथ-साथ इस बहस के सम्बंध में सम्बंधित पाठकों के सामने इस पूरे प्रकरण की सचाई सामने आ सके।
सधन्यवाद!
आपका
उद्भ्रांत
बी-463, केन्द्रीय विहार
सेक्टर-51, नोएडा-201303
मो0 -0919818854678

गड़बड़झाला

उद्भ्रांत 

डा. उदयभानु पाण्डे से कभी भेंट नहीं हुई- फ़ोन पर हुई एक-आध बार की बातचीत को छोड़कर। गत वर्ष ‘अकार’ में प्रकाशित उनका लेख अच्छा लगा था और ’कथादेश’ की मौजूदा मैराथन बहस में भी उनका हस्तक्षेप सार्थक था- सिर्फ़ मेरे लिए प्रयुक्त विशेषण को छोड़कर, जिस कारण ख़ामखाँ उन्हें इन पंक्तियों के लेखक के ‘शीर्ष’ पर रखकर चलाई गई अर्चना वर्मा की बंदूक का सामना करना पड़ा! मैंने तो पहले ही अपनी सम्बन्धित हतप्रभता से उन्हें टेलीफ़ोन पर अवगत कराया था।

 गत लगभग पूरे दिसम्बर माह जब मैं पत्नी की अस्वस्थता के कारण नोएडा के एक निजी अस्पताल में रहा तो किसी दिन उन्होंने फ़ोन पर यह सूचना दी थी, तब मैने सेक्टर-34 के समाचारपत्र विक्रेता से उक्त अंक मँगवाया । ये वही दिन थे जब राजधानी में हुई गैंगरेप की दुर्दांत घटना के चलते देश दुःख और गुस्से की समवेत आग में जल रहा था और मेरी इकाई भी उसी का हिस्सा थी। लिखना तो कहां हो सकता था-अश्लीलता के पक्ष में लिखे उस गरिष्ठ लेख को पढ़ना भी, एन्टीबायोटिक दवाओं के प्रभाव से पत्नी के सोने के बाद, टुकड़ों-टुकड़ों में कई रात्रियों से छनकर मिले समय में ही संभव हो सका। स्थिति सामान्य होने के बाद अब जाकर नये वर्ष के इस पहले महीने के मध्य में यह टिप्पणी लिख पा रहा हूँ।

 क्योंकि सच कहूँ तो इस बहस को इतना लम्बा खींचने की सुश्री वर्मा की अप्रासंगिक भूूमिका से मुझे अफ़सोस हुआ है। वरना, न तो उनसे, न संदर्भित कवि-द्वय से मेरी कोई लाग-डाँट है। शालिनी के लेख पर सबसे पहली स्वतःस्फूर्त टिप्पणी भी मैने इसी कारण लिखी थी, जिसके सन्दर्भ में उन्होंने पत्रकारिता की नैतिकता के विरूद्ध कार्य किया। इन्हीं सब बातों ने मुझे दोबारा कलम उठाने को विवश किया है।

 लेकिन अपना क्षोभ व्यक्त करने से पहले उसके कारक बने तीन प्रमुख किरदारों का ज़िक्र ज़रूरी है। जैसा कि संकेत किया है, अर्चना जी को सूरत से कम, ‘प्रसंगवश’ सीरत से अधिक पहचानता हूँ। 16-17 वर्ष पूर्व राजेन्द्र यादव ने ‘हंस’ कार्यालय में मन्नू जी के साथ बैठीं एक भद्र महिला के बारे में कहा था कि ये अर्चना वर्मा हैं। मैं गोरखपुर से स्थानान्तरित होकर उप कार्यक्रम नियंत्रक के रूप में दूरदर्शन महानिदेशालय आया ही था और वर्ष 1970 से प्रारम्भ सम्बन्धों के चलते हमेशा की तरह दिल्ली आते ही उनसे मिलने पहुँच गया था। तब शायद रस्मी दुआ-सलाम ज़रूर हुआ होगा। बस उसे छोड़कर उनसे कभी एक शब्द का भी आदान -प्रदान नहीं हुआ। सुश्री अनामिका का नाम पहली बार तब सुना था, जब वर्ष 1984 में कानपुर के मित्र प्रकाशक साहित्य रत्नालय के श्री महेश त्रिपाठी ने मेरे तीन काव्यसंग्रहों के साथ उनका एक उपन्यास छापा था। दिल्ली आगमन के बाद इस सम्बन्ध में याद दिलाने पर उन्होंने उसे किशोरावस्था की कृति बताते हुए ख़ास महत्व नहीं दिया था-

 यद्यपि बाद में शायद किसी अन्य नाम से वह दिल्ली से भी छप गया था। प्रारम्भ में उनकी कुछ कविताओं ने मुझे आकर्षित किया था, मगर इधर लगता है कि वे अति आत्मविश्वास, अहंकार और गुरूडम का शिकार होकर क्षेत्रीय और भाषायी राजनीति करने के साथ साथ स्वयं को ‘शीर्ष कवयित्री’ कहने-कहलाने में अपनी शान समझती हैं। वरिष्ठों की अवमानना और कनिष्ठों से चरणस्पर्श की कांक्षा उनके व्यवहार में नज़र आती है। यहां उनकी शालीन चुप्पी श्रेयस्कर होती-उस प्रतिक्रिया की तुलना में-जो उन्होंने अपनी मित्र के कहने पर दी । अकारण नहीं है कि उनके पक्ष में नियोजित की गईं दो-तीन दलीलें इसीलिए बेहद कमज़ोर हैं-उनकी सबसे बड़ी पैरोकार के साथ, जो व्यवहार में उन्हीं की राह की बगलगीर हैं। जबकि हम आज से नहीं, सदियों से जानते हैं कि कविता का पथ अनंत का पथ है। चरैवेति, चरैवेति। वर्ष 1959 से प्रारम्भ इस यात्रा में फ़िलहाल तो आधी सदी ही पार हुई है। और वर्ष 1960 में ही पहली कविता छपने के कारण प्रकाशन- यात्रा में भी उतनी अवधि बीत चुकी है। पोर्न कवितायें  लिखने और उनकी अर्चना करने वाले उसी के आसपास इस धरा पर अवतरित हुए होंगे, इसलिए उन्हें मुझसे शिकायत है तो वह स्वाभाविक ही है।

 लेकिन वे इतना तो जान ही लें कि इस यत्किंचित लम्बी यात्रा के बाद और कुल सत्तर पुस्तकों में कविता की ही तीस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित होने के बाद भी मुझे स्वयं को सामान्य कवि मानने तक में पसोपेश होता है-‘शीर्ष स्तर’ तो बहुत दूर की कौड़ी है। ऐसे विशेषण उन्हीं को मुबारक़! पाण्डेय जी ने ठीक ही गोस्वामी जी की मदद ली है- खल परिहास होहि हित मोरा! अंतिम किरदार ‘कथादेश’ सम्पादक तो मेरे तब के मित्र हैं, जब वे आगरा से एक मासिक पत्रिका ‘रूप कंचन’ निकालते थे और वर्ष 1975 में उसके प्रस्तावित कहानी विशेषांक में मेरी कहानी आमंत्रित करते हुए उन्होंने, तब कानपुर निवासी, मुझे एकाधिक पत्र लिखे थे। ज़ाहिर है कि तब वे सीधे, सरल इंसान थे- आज की तुलना में -जो कथा-प्रकाशन की दृष्टि से मार्च 1974 में ‘कहानी पत्रिका’ में जनमे एक उद्भ्रांत कथाकार से भी कहानी मांगने में संकोच नहीं करते थे! खैर!

अब अपने क्षोभ का खुलासा:

 1. पाण्डेय जी ने लिखा था कि ‘‘उद्भ्रांत ने सटीक टिप्पणी की है,  लेकिन लगता है उसमें कुछ छूट गया है’’। अर्चना वर्मा ने ‘मौनं स्वीकृति लक्षणम्’ के अनुसार इसे ठीक क़रार दिया है (अन्यथा वे इसका खंडन ज़रूर करतीं), और दिसम्बर 2012 की उनकी सफाई के अनुसार यह प्रकट है कि ‘कुछ छूटा’ नहीं था। दरअसल उन्होंने जानबूझ कर उसे काट दिया था- श्री हरिनारायण की निस्पृहता का बेजा लाभ लेकर उनके सम्पादकीय अधिकार का स्वयं इस्तेमाल करते हुए । सवाल है कि उन्होंने मेरे लेख को देखने के तुरंत बाद संदर्भित कवियों से और अन्यों से भी बचाव जैसी कार्यवाही  के लिए क्यों कहा? स्वाभाविक रूप से उनकी प्रतिक्रिया आती तो कुछ भी ग़लत नहीं था, मगर यहां दबाव डालकर लिखवाने की कोशिशें हुईं। आखिर इस दुरभिसंधि में वे क्यों शामिल हुईं? मेरे लेख को एक महीने इसीलिए विलंबित किया गया, ताकि उनके कार्टेल को उतना समय अपनी तैयारी के लिए मिल जाये!

 फिर वह कौन सा डर था कि अगस्त 2012 में अधोहस्ताक्षरी के लेख को प्रकाशित तो किया गया – यह दिखाने के लिए कि हम बडे़ ‘लोकतांत्रिक’ है(!)-मगर उसके ज़रूरी बड़े हिस्से को काट दिया गया? यह जर्नलिस्टिक एथिक्स के खिलाफ़ था, जिसके अंर्तगत सम्पादक उभयपक्षीय रहने के लिए बाध्य होता है। शायद इसीलिए हरि नारायण ने उसका पालन किया। मगर तब सवाल है कि उन्होंने अपनी सहयोगी को उनके अधिकार क्षेत्र में प्रवेश की अनुमति क्यों दी? पत्रकारिता की नैतिकता का सवाल उठाने का अधिकार कम से कम मुझे तो इसलिए भी है कि मैं वर्ष 1970 में ‘युगप्रतिमान’ पाक्षिक और वर्ष 1974-’77 में अनियतकालीन पत्रिका ‘युवा’ का सम्पादन कर चुका हूँ-दैनिक ‘आज’ के कानपुर संस्करण के सम्पादकीय विभाग में कार्य के अलावा।

 2. मेरा जो चार पृष्ठीय लेख 13 मई 2012 को ईमेल से और 15 मई 2012 को कूरियर से मिल चुका था, उसे जुलाई 2012 के अंक में क्यों नहीं दिया गया और अगस्त अंक में अन्यों के साथ दिया भी गया तो उसके सबसे ज़रूरी बाद के उन ढाई पृष्ठों को किस सम्पादकीय विवेक से काटा गया (उन्होने शालिनी माथुर को फ़ोन पर ऐसा कहा था), जहां से मैंने बिन्दुवार शालिनी के लेख की मीमांसा शुरू की थी? किस सम्पादकीय विवेक से अपने ‘प्रसंगवश’ के छह और आशुतोष कुमार के पांच पृष्ठों को उसी अंक में दिया गया, जबकि आशुतोष के लेख के दो पृष्ठों में उन्हीं कविताओं का पुनर्मुद्रण था जिसकी कोई आवश्यकता नहीं थी?

3. इसका रहस्य विद्वान पाठकों के समक्ष मैं उजागर कर देता हूँ। दरअसल लेख के जानबूझकर छोड़े या काटे गये हिस्से में ही मेरी वह भविष्यवाणी भी थी कि सम्बन्धित कार्टेल जिसने इतनी जोड़-तोड़ के बाद ऐसी उपलब्धि हासिल की है-चुप नहीं बैठेगा। अब आप पाठक साक्षी हैं कि भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। यह देखना दिलचस्प है कि सुश्री वर्मा ने अपने दिसंबर के सुदीर्घ ग्यारह पृष्ठीय ‘बयान’ में सुश्री अनामिका पर दबाव डालकर लिखवाने की बात कहकर उसे मान भी लिया है। ज़ाहिर है कि औरों से भी ऐसे ही कहा होगा, तभी अगस्त अंक में अपने सिपहसालारों के साथ वे बचाव पक्ष में प्रकट र्हुइं और दिसंबर अंक में उसकी स्वघोषित कुतार्किक परिणति के साथ ही उन्होंने ठंडी साँस ली। मेरा लेख जुलाई 2012 में ही छपता तो वे अपने कार्टेल को कैसे सक्रिय कर पातीं! अगस्त में भी वह पूरा छपता तो सब बेनक़ाब हो रहे थे। लेकिन सप्ताह भर के अन्दर ही पचासों ब्लॉग्स में और महीने के अंत तक ‘दुनियाँ इन दिनों’ (सं सुधीर सक्सेना) में इस साज़िश के खुलासे के साथ पूरा लेख छपने के कारण अंततः वे बेनक़ाब तो हो ही गये।

 4. उन्होंने पक्ष-विपक्ष भी रेखांकित कर दिया है, मगर यहाँ गड़बड़झाला हो गया है। वादी को प्रतिवादी और प्रतिवादी को वादी कहा जा रहा है। स्वयं वे पहले तो आरोपी के बचाव पक्ष की भूमिका में प्रकट होती हैं और अंत में अच्छी कविता के बचाव के लिए जिरह करने वाली शालिनी माथुर को जवाब देने का मौक़ा दिये बिना मनमाने ढंग से प्रबुद्ध जनता को न्यायाधीश की कुर्सी से उतार कर स्वयं काबिज़ हो, फ़ैसला लिखने लग जाती हैं। पाठकों को स्मरण होगा कि ‘कथादेश’ में प्रकाशित अधूरी टिप्पणी के दूसरे ही पैरा में मैंने इस पूरे प्रसंग को ‘अदालत का रूपक’ दिया था, जिसमें पाठक को न्यायाधीश कहा गया था (पहले में ‘आपरेशन थियेटर’ का)। वहीं से प्रेरित होकर सुश्री वर्मा ने बैरिस्टर जनरल की भूमिका अख़्तियार कर ली।

 5. किसी कृति पर फ़ैसला देने का अधिकार सिर्फ पाठक का होता है। दुनियाँ का कोई लेखक उसे मूर्ख मानने की हिमाक़त नहीं करता, जिसे अर्चना जी कर रही हैं। उनकी गूढ़ भाषा भी इसकी चुगली करती है। अपनी नातिदीर्घ रचना-यात्रा में दुरूहतम भाषा लिखने वाले आलोचकों तक से पाला पड़ने के कारण मैं तो येन-केन-प्रकारेण द्रविड़ प्राणायाम करके उनकी बात का मर्म निकाल लेता हूँ, लेकिन अधिकांश पाठक वर्ग को वह समझ में नहीं आती। और पाठक तो सभी तरह के है, जिनमें विद्वानों की संख्या भी कम नहीं।

 6. बहस को जो प्रारम्भ करता है, वही उसका समापन करता है, यह मामूली -सी बात भी वे नहीं जानतीं। शालिनी के उत्तर के बिना यह बहस किसी तार्किक परिणाम तक नहीं पहुँच सकेगी। आशा है उसके समापन की घोषणा भी सम्पादक महोदय ही करेंगे, कोई अन्य नहीं!
 साहित्य जगत का एक बहुत ज़रूरी और बड़ा नाम.२००८ के भवानी प्रसाद मिश्र सम्मान से नवाजे जा चुके वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत जी पिछले समय उनकी पुस्तक अस्ति  से भी चर्चा में रहे हैं.

उद्भ्रांत 

संपर्क सूत्र–बी-463, केन्द्रीय विहार,
सेक्टर-51, नोएडा-201303,
मोबाइल: 09818854678

Friday, November 2, 2012

कृष्ण और आकांक्षा 'ब्लागिंग' में उत्कृष्ट कार्य हेतु 'अवध सम्मान' से सम्मानित


जीवन में कुछ करने की चाह हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। हिन्दी-ब्लागिंग के क्षेत्र में ऐसा ही रास्ता अखि़्तयार किया दम्पति कृष्ण कुमार यादव व आकांक्षा यादव ने। उनके इस जूनून के कारण ही आज हिंदी ब्लागिंग को आधिकारिक तौर पर भी विधा के रूप में मान्यता मिलने लगी है. इसी क्रम में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने 1 नवम्बर, 2012 को इलाहाबाद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएं कृष्ण कुमार यादव और उनकी पत्नी आकांक्षा यादव को 'न्यू मीडिया एवं ब्लागिंग' में उत्कृष्टता के लिए एक भव्य कार्यक्रम में 'अवध सम्मान' से सम्मानित किया गया. जी न्यूज़ द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन ताज होटल, लखनऊ में किया गया था, जिसमें विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित किया गया, पर यह पहली बार हुआ जब किसी दम्पति को युगल रूप में यह प्रतिष्ठित सम्मान दिया गया. ब्लागर दम्पति को सम्मानित करते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जहाँ न्यू मीडिया के रूप में ब्लागिंग की सराहना की, वहीँ कृष्ण कुमार यादव ने अपने संबोधन में उनसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए जा रहे सम्मानों में 'ब्लागिंग' को भी शामिल करने का अनुरोध किया. आकांक्षा यादव ने न्यू मीडिया और ब्लागिंग के माध्यम से भ्रूण-हत्या, नारी-उत्पीडन जैसे मुद्दों के प्रति सचेत करने की बात कही. अन्य सम्मानित लोगों में वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी, चर्चित लोकगायिका मालिनी अवस्थी, ज्योतिषाचार्य पं. के. ए. दुबे पद्मेश, वरिष्ठ आई.एस. अधिकारी जय शंकर श्रीवास्तव इत्यादि प्रमुख रहे. 

जीवन में एक-दूसरे का साथ निभाने की कसमें खा चुके कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव, साहित्य और ब्लागिंग में भी हमजोली बनकर उभरे हैं. कृष्ण कुमार यादव ब्लागिंग और हिन्दी-साहित्य में एक चर्चित नाम हैं, जिनकी 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनके जीवन पर एक पुस्तक ’बढ़ते चरण शिखर की ओर’ भी प्रकाशित हो चुकी है। आकांक्षा यादव भी नारी-सशक्तीकरण को लेकर प्रखरता से लिखती हैं और उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । कृष्ण कुमार-आकांक्षा यादव ने वर्ष 2008 में ब्लाग जगत में कदम रखा और 5 साल के भीतर ही सपरिवार विभिन्न विषयों पर आधारित दसियों ब्लाग का संचालन-सम्पादन करके कई लोगों को ब्लागिंग की तरफ प्रवृत्त किया और अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता के साथ-साथ ब्लागिंग को भी नये आयाम दिये। कृष्ण कुमार यादव का ब्लॉग 'शब्द-सृजन की ओर' (http://www.kkyadav.blogspot.in/) जहाँ उनकी साहित्यिक रचनात्मकता और अन्य तमाम गतिविधियों से रूबरू करता है, वहीँ 'डाकिया डाक लाया' (http://dakbabu.blogspot.in/) के माध्यम से वे डाक-सेवाओं के अनूठे पहलुओं और अन्य तमाम जानकारियों को सहेजते हैं. आकांक्षा यादव अपने व्यक्तिगत ब्लॉग 'शब्द-शिखर' (http://shabdshikhar.blogspot.in/) पर साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों और विशेषत: नारी-सशक्तिकरण को लेकर काफी मुखर हैं. इस दम्पति के ब्लागों को सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भरपूर सराहना मिली। कृष्ण कुमार यादव के ब्लाग ’डाकिया डाक लाया’ को 98 देशों, ’शब्द सृजन की ओर’ को 75 देशों, आकांक्षा यादव के ब्लाग ’शब्द शिखर’ को 68 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है. सबसे रोचक तथ्य यह है कि यादव दम्पति ने अभी से अपनी सुपुत्री अक्षिता (पाखी) में भी ब्लागिंग को लेकर जूनून पैदा कर दिया है. पिछले वर्ष ब्लागिंग हेतु भारत सरकार द्वारा ’’राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’’ से सम्मानित अक्षिता (पाखी) का ब्लाग ’पाखी की दुनिया’ (http://pakhi-akshita.blogspot.in/) बच्चों के साथ-साथ बड़ों में भी काफी लोकप्रिय है और इसे 98 देशों में देखा-पढ़ा जा चुका है। इसके अलावा इस ब्लागर दम्पति द्वारा 'उत्सव के रंग', 'बाल-दुनिया', 'सप्तरंगी प्रेम' इत्यादि ब्लॉगों का भी सञ्चालन किया जाता है. 

इस अवसर पर उ.प्र. विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय, रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, केबिनेट मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव, अनुप्रिया पटेल, मेयर दिनेश शर्मा सहित मंत्रिपरिषद के कई सदस्य, विधायक, कार्पोरेट और मीडिया से जुडी हस्तियाँ, प्रशासनिक अधिकारी, साहित्यकार, पत्रकार, कलाकर्मी व खिलाडी इत्यादि उपस्थित रहे. आभार ज्ञापन जी न्यूज उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के संपादक वाशिन्द्र मिश्र ने किया. 

-डा. विनय कुमार शर्मा 
प्रधान संपादक-संचार बुलेटिन (अंतराष्ट्रीय शोध जर्नल)
448/119/76, कल्याणपुरी, ठाकुरगंज, चैक, लखनऊ-226003

Wednesday, August 29, 2012

ब्लॉग लेखकों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न




दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उदघाटन करते वरिष्ठ साहित्यकार उद्भान्त, साथ मे शिखा वार्ष्नेय,गिरीश पंकज,रणधीर सिंह सुमन और रवीन्द्र प्रभात

दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का उदघाटन करते वरिष्ठ साहित्यकार उद्भान्त, साथ मे शिखा वार्ष्नेय,गिरीश पंकज,रणधीर सिंह सुमन और रवीन्द्र प्रभात

"आज से 75 साल पहले सन 1936 में लखनऊ शहर प्रगतिषील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन का गवाह बना था, जिसकी गूंज आज तक सुनाई पड़ रही है। उसी प्रकार आज जो लखनऊ में ब्लॉग लेखकों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हो रहा है, इसकी गूंज भी आने वाले 75 सालों तक सुनाई पड़ेगी।" 
उपरोक्त विचार बली प्रेक्षागृह, कैसरबाग, लखनऊ में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रतिष्ठित कवि उद्भ्रांत ने व्यक्त किये। सकारात्मक लेखन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह सम्मेलन तस्लीम एवं परिकल्पना समूह द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में पूर्णिमा वर्मन (शरजाह) रवि रतलामी (भोपाल), शिखा वार्ष्णेय (लंदन), डॉ0 अरविंद मिश्र (वाराणसी), अविनाश वाचस्पति (दिल्ली), मनीष मिश्र (पुणे), इस्मत जैदी (गोवा), आदि ब्लॉगरों ने अपने उद्गार व्यक्त किये। कार्यक्रम को मुद्राराक्षस, शैलेन्द्र सागर, वीरेन्द्र यादव, राकेश, शकील सिद्दीकी, शहंशाह आलम, डॉ. सुभाष राय, डॉ. सुधाकर अदीब, डॉ विनय दास आदि वरिष्ठ साहित्यकारों ने भी सम्बोधित किया।
मंचासीन डॉ सुभाष राय,सुश्री शिखा वार्ष्नेय,वरिष्ठ साहित्यकार उद्भ्रांत, कथा क्रम के संपादक शैलेंद्र सागर, डॉ अरविंद मिश्रा, गिरीश पंकज आदि
मंचासीन डॉ सुभाष राय,सुश्री शिखा वार्ष्नेय,वरिष्ठ साहित्यकार उद्भ्रांत, कथा क्रम के संपादक शैलेंद्र सागर, डॉ अरविंद मिश्रा, गिरीश पंकज आदि
वक्ताओं ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इंटरनेट एक ऐसी तकनीक है, जो व्यक्ति को अभिव्यक्ति का जबरदस्त साधन उपलब्ध कराती है, लोगों में सकारात्मक भावना का विकास करती है, दुनिया के कोने-कोने में बैठे लोगों को एक दूसरे से जोड़ने का अवसर उपलब्ध कराती है और सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों के विरूद्ध जागरूक करने का जरिया भी बनती है। इसकी पहुँच और प्रभाव इतना जबरदस्त है कि यह दूरियों को पाट देता है, संवाद को सरल बना देता है और संचार के उत्कृष्ट साधन के रूप में उभर कर सामने आता है। लेकिन इसके साथ ही साथ जब यह अभिव्यक्ति के विस्फोट के रूप में सामने आती है, तो उसके कुछ नकारात्मक परिणाम भी देखने को मिलते हैं। ये परिणाम हमें दंगों और पलायन के रूप में झेलने पड़ते हैं। यही कारण है कि जब तक यह सकारात्मक रूप में उपयोग में लाया जाता है, तो समाज के लिए अलादीन के चिराग की तरह काम करता है, लेकिन जब यही अवसर नकारात्मक स्वरूप अख्तियार कर लेता है, तो समाज में विद्वेष और घृणा की भावना पनपने लगती है और नतजीतन सरकारें बंदिषें का हंटर सामने लेकर सामने आ जाती हैं। लेकिन यदि रचनाकार अथवा लेखक सामाजिक सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इस इंटरनेट का उपयोग करे, तो कोई कारण नहीं कि उसके सामने किसी तरह का खतरा मंडराए। इससे समाज में प्रेम और सौहार्द का विकास भी होगा और देष तरक्की की सढ़ियाँ भी चढ़ सकेगा।
परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान
दशक के ब्लॉगर: (१) पूर्णिमा वर्मन (२) समीर लाल समीर (३) रवि रतलामी(४) रश्मि प्रभा (५) अविनाश वाचस्पति
दशक के ब्लॉग: (१) उड़न तश्तरी: ब्लॉगर समीर लाल समीर (२) ब्लोग्स इन मिडिया: ब्लॉगर बी एस पावला (३) नारी: ब्लॉगर रचना (४) साई ब्लॉगः ब्लॉगर डॉ अरविंद मिश्र (५) साइंस ब्लोगर असोसिएशन: ब्लॉगर डॉ अरविंद मिश्र डॉ जाकिर अली रजनीश
दशक के ब्लॉगर दंपति:
कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव

तस्लीम परिकल्पना सम्मान-2011

मुकेश कुमार सिन्हा, देवघर, झारखंड ( वर्ष के श्रेष्ठ युवा कवि) , संतोष त्रिवेदी, रायबरेली, उत्तर प्रदेश (वर्ष के उदीयमान ब्लॉगर), प्रेम जनमेजय, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ व्यंग्यकार ),राजेश कुमारी, देहरादून, उत्तराखंड (वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, यात्रा वृतांत ), नवीन प्रकाश,रायपुर, छतीसगढ़ (वर्ष के युवा तकनीकी ब्लॉगर),अनीता मन्ना,कल्याण (महाराष्ट्र) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग सेमिनार के आयोजक),डॉ. मनीष मिश्र, कल्याण (महाराष्ट्र) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग सेमिनार के आयोजक),सीमा सहगल(रीवा,मध्यप्रदेश) रू रश्मि प्रभा ( वर्ष की श्रेष्ठ टिप्पणीकार, महिला ), शाहनवाज,दिल्ली (वर्ष के चर्चित ब्लॉगर, पुरुष ), डॉ जय प्रकाश तिवारी (वर्ष के यशस्वी ब्लॉगर),नीरज जाट, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ लेखक, यात्रा वृतांत),गिरीश बिललोरे मुकुल,जबलपुर (मध्यप्रदेश) (वर्ष के श्रेष्ठ वायस ब्लॉगर), दर्शन लाल बवेजा,यमुना नगर (हरियाणा) (वर्ष के श्रेष्ठ विज्ञान कथा लेखक),शिखा वार्ष्णेय, लंदन ( वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, संस्मरण), इस्मत जैदी,पणजी (गोवा) (वर्ष का श्रेष्ठ गजलकार),राहुल सिंह, रायपुर, छतीसगढ़ (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग विचारक),बाबूशा कोहली, लंदन (यूनाइटेड किंगडम) (वर्ष की श्रेष्ठ कवयित्री ), रंजना (रंजू) भाटिया,दिल्ली (वर्ष की चर्चित ब्लॉगर, महिला),सिद्धेश्वर सिंह, खटीमा (उत्तराखंड) (वर्ष के श्रेष्ठ अनुवादक), कैलाश चन्द्र शर्मा, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ वाल कथा लेखक ),धीरेंद्र सिंह भदौरोया (वर्ष के श्रेष्ठ टिप्पणीकार, पुरुष),शैलेश भारतवासी, दिल्ली (वर्ष के तकनीकी ब्लॉगर),अरविंद श्रीवास्तव, मधेपुरा (बिहार) (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग समीक्षक),अजय कुमार झा, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग खबरी),सुमित प्रताप सिंह, दिल्ली (वर्ष के श्रेष्ठ युवा व्यंग्यकार),रविन्द्र पुंज, यमुना नगर (हरियाणा) (वर्ष के नवोदित ब्लॉगर), अर्चना चाव जी, इंदोर (एम पी) (वर्ष की श्रेष्ठ वायस ब्लॉगर),पल्लवी सक्सेना,भोपाल (वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, सकारात्मक पोस्ट) ,अपराजिता कल्याणी, पुणे (वर्ष की श्रेष्ठ युवा कवयित्री ) ,चंडी दत्त शुक्ल, जयपुर (वर्ष के श्रेष्ठ लेखक, कथा कहानी ),दिनेश कुमार माली,बलराजपुर (उड़ीसा) वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (संस्मरण ),डॉ रूप चंद शास्त्री मयंक (खटीमा) वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार, सुधा भार्गव,वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका, डॉ हरीश अरोड़ा, दिल्ली ( वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग समीक्षक ) आदि

तस्लीम परिकल्पना विशेष ब्लॉग प्रतिभा सम्मान-2011

कुँवर कुसुमेश, लखनऊ, प्रीत अरोड़ा, चंडीगढ़, सुनीता शानू, दिल्ली, कनिष्क कश्यप, दिल्ली, निर्मल गुप्त, मेरठ, मुकेश कुमार तिवारी, इंदोर,अल्का सैनी,चंडीगढ़,प्रवीण त्रिवेदी, फ़तहपुर आदि

वटवृक्ष का लोकार्पण : वायें से सुश्री शिखा वार्ष्नेय,रवीन्द्र प्रभात,डॉ अरविंद मिश्रा, डॉ सुभाष राय, श्री शैलेंद्र सागर,श्री उद्भ्रांत, श्री गिरीश पंकज,ज़ाकिर अली रजनीश,रणधीर सिंह सुमन व अन्य

वटवृक्ष का लोकार्पण : वायें से सुश्री शिखा वार्ष्नेय,डॉ अरविंद मिश्रा, रवीन्द्र प्रभात, डॉ सुभाष राय, श्री शैलेंद्र सागर,श्री उद्भ्रांत, श्री गिरीश पंकज,ज़ाकिर अली रजनीश,रणधीर सिंह सुमन व अन्य

इस अवसर पर देश के कोने-कोने से आए 200 से अधिक ब्लॉगर, लेखक, संस्कृतिकर्मी और विज्ञान संचारक भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में तीन चर्चा सत्रों (न्यू मीडिया की भाषाई चुनौतियाँ, न्यू मीडिया के सामाजिक सरोकार, हिन्दी ब्लॉगिंगः दशा, दिशा एवं दृष्टि) में रचनाकारों ने अपने विचार रखे। इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक रवीन्द्र प्रभात ने ब्लॉगरों की सर्वसम्मति से सरकार से ब्लॉग अकादमी के गठन की मांग की, जिससे ब्लॉगरों को संरक्षण प्राप्त हो सके और वे समाज के विकास में सकारात्मक योगदान दे सकें।

इस अवसर पर ‘वटवृक्ष‘ पत्रिका के ब्लॉगर दषक विषेषांक का लोकार्पण किया गया, जिसमें हिन्दी के सभी महत्वपूर्ण ब्लॉगरों के योगदान को रेखांकित किया गया है। इसके साथ ही साथ कार्यक्रम के सह संयोजक डॉ0 जाकिर अली रजनीश की पुस्तक ‘भारत के महान वैज्ञानिक‘ एवं अल्का सैनी के कहानी संग्रह ‘लाक्षागृह‘ तथा मनीष मिश्र द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘हिन्दी ब्लॉगिंगः स्वरूप व्याप्ति और संभावनाएं‘ का भी लोकार्पण इस अवसर पर किया गया।

कार्यक्रम के दौरान ब्लॉग जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए पूर्णिमा वर्मन, रवि रतलामी, बी एस पावला, रचना, डॉ अरविंद मिश्र, समीर लाल समीर, कृष्ण कुमार यादव और आकांक्षा यादव को ‘परिकल्पना ब्लॉग दशक सम्मान‘ से विभूषित किया गया।

इसके साथ ही साथ अविनाश वाचस्पति को प्रब्लेस चिट्ठाकारिता शिखर सम्मान, रश्मि प्रभा को शमशेर जन्मशती काव्य सम्मान, डॉ सुभाष राय को अज्ञेय जन्मशती पत्रकारिता सम्मान, अरविंद श्रीवास्तव को


लखनऊ में स्थापित होगा डॉ राम मनोहर लोहिया ब्लॉगर पीठ, इस आशय का प्रस्ताव संयोजक रवीन्द्र प्रभात ने सभा पटल पर रखा जिसे ध्वनि मत से पारित कर दिया गया। साथ ही इस अवसर पर रवीन्द्र प्रभात ने ब्लॉगर कोश बनाने की बात कही ।

रवीन्द्र प्रभात ने कहा कि "डॉ. राम मनोहर लोहिया स्मृति  ब्लॉगर पीठ,लखनऊ के गठन का यह प्रस्ताव आपके समक्ष विचारार्थ और अनुमोदन हेतु प्रस्तुत है और यह भी अनुरोध है कि इसे माननीय मुख्यमंत्री जी उत्तर प्रदेश के समक्ष प्रस्तुत करने को भी आप ध्वनि मति से अनुमति प्रदान करें ...अन्य आनुषांगिक औपचारिकताओं (मोडे लिटी) को अंतिम रूप दिया जा रहा है ।"

केदारनाथ अग्रवाल जन्मशती साहित्य सम्मान, शहंशाह आलम को गोपाल सिंह नेपाली जन्मशती काव्य सम्मान, शिखा वार्ष्णेय को जानकी बल्लभ शास्त्री स्मृति साहित्य सम्मान, गिरीश पंकज को श्रीलाल शुक्ल व्यंग्य सम्मान, डॉ. जाकिर अली रजनीश को फैज अहमद फैज जन्मशती सम्मान तथा 51 अन्य ब्लॉगरों को ‘तस्लीम-परिकल्पना सम्मान‘ प्रदान किये गये।

(लखनऊ डॉ जाकिर अली रजनीश की रपट )

Friday, August 24, 2012

लखनऊ से मासिक पत्रिका समकालीन सरोकार का प्रकाशन शीघ्र

हिंदी के कद्दावर संपादक डॉ सुभाष राय और प्रखर युवा पत्रकार हरे प्रकाश उपाध्याय के संयुक्त प्रयास से एक ऐसी मासिक पत्रिका का प्रकाशन लखनऊ से प्रारंभ होने जा रहा है जो समकालीन स्वर को केवल धार ही न देगी, अपितु समय की शीला पर एक अमिट छाप छोड़ते हुए समाज में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराने में सफल होगी, ऐसी प्रतिबद्धता संपादक के वक्तव्य से महसूस किया जा सकता है । प्रस्तुत है डॉ सुभाष राय जी और श्री हरे प्रकाश जी के  अवधारणा-पत्र  का महत्वपूर्ण अंश :

आदऱणीय साथी,
किसी भी समाज में मीडिया की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका होती है। न केवल समाचारों को बिना किसी रंग के पूरी वस्तुनिष्ठता से लोगों तक ले जाने में बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गत्यात्मकता को, इन क्षेत्रों में छोटे से छोटे परिवर्तनों के निहितार्थ एवं संभावित परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक करने में। आजादी की लड़ाई को ताकत देने में मीडिया की बड़ी भूमिका रही है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन अब वो हाल नहीं है। मीडिया का चेहरा बहुत बदल गया है। खासकर हिंदी मीडिया की दशा-दिशा तो बहुत ही चिंतनीय है। हिंदी के पाठक की जरूरत से पूरी तरह अनजान कुछ खास किस्म के अंग्रेजीदां प्रबंधक तय कर रहे हैं कि हिंदीवालों को क्या पढ़ना चाहिए। वे यह प्रचारित भी कर रहे हैं कि वे जो सामग्री अखबारों में परोस रहे हैं, वही और सिर्फ वही लोग पढ़ना चाहते हैं। उन्होंने कभी कोई सर्वे नहीं किया, कभी पढ़ने वालों से जाकर पूछा नहीं कि वे जो सोच रहे हैं, वह सही है भी या नहीं। उन्हें इसकी जरूरत भी नहीं है। उनका मंसूबा ही कुछ और है। वे तो पूंजी के खेल के हिस्से भर हैं,  मीडिया के विशाल कारोबार में छोटे-मोटे पुर्जे भर हैं। वे पूंजी के वफादार सिपाही हैं।

       वे कुछ ऐसा चमत्कार करने की कोशिश में हैं कि ज्यादा से ज्यादा लाभ के हालात बने। यह कमाई पाठकों के अखबार खरीदने से नहीं हो सकती, यह तो केवल और केवल विज्ञापन से हो सकती है। परंतु विज्ञापन आए, इसके लिए पाठकों की तादाद ज्यादा से ज्यादा होनी चाहिए। जाहिर है वे अपना सर्कुलेशन बढ़ाना तो चाहते हैं लेकिन इसलिए नहीं कि उन्हें हिंदी की या पाठकों की बहुत चिंता है बल्कि इसलिए कि वे अधिकतम विज्ञापन समेटना चाहते हैं। पाठक संख्या बढ़ाने के तमाम खेल हैं, उसका अखबारों की सामग्री और पाठकों की पसंद से कोई वास्ता नहीं। इस होड़ में पिछले कुछ वर्षों में समाचारपत्रों ने न केवल अपने मूल्य ( नैतिक व आर्थिक दोनों स्तरों पर) बेतरह घटाये हैं, बल्कि तमाम तरह के इनामों के लालच भी पाठकों को देने शुरू कर दिये हैं। वे पाठक को अब पाठक नहीं ग्राहक समझते हैं और उसे मूर्ख बनाकर या ललचाकर खरीद लेना चाहते हैं।
  मीडिया के जरिये पूंजीवादी ताकतें खतरनाक षड्यंत्रकारी भूमिका भी निभा रही हैं। अखबारों में ऐसी खबरें या टिप्पणियाँ बहुत कम नजर आती हैं, जो जनता को जगा सकें, जनचेतना को धारदार बना सकें। एक तरफ सत्ता और पूंजीवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ जाने वाली ज्यादातर सूचनाओं को दबाने की कोशिशें की जा रहीं हैं, तो दूसरी ओर नाच-गाने, मौज-मस्ती, माल-टाल की चकाचौंध में उलझाकर आदमी को निष्क्रिय और निस्तेज बनाने का अभियान चलाया जा रहा है। मीडिया प्रतिपक्ष की अपनी भूमिका भूलकर सत्ता प्रतिष्ठानों के आगे दुम हिलाता दिखाई पडता है।

    व्यवसाय कोई बुरी चीज नहीं है, विज्ञापन भी अपना सूचनात्मक महत्व रखता है, समाज को उसकी भी जरूरत हो सकती है, लेकिन इन्हें लूट, धोखा और झूठ की सीमा तक नहीं जाना चाहिए। कहना न होगा कि विज्ञापनों की दुनिया में फरेब भरा पड़ा है। मीडिया को इसकी चिंता ज्यादा है, अपने पाठकों की कम। यह अधूरा सच होगा, अगर कहा जाय कि पाठक अखबारों की सामग्री से संतुष्ट है, उसे किसी और चीज की तलाश नहीं है। पिछले दो सालों में मुझे एक बिल्कुल नया अनुभव हुआ कि अखबारों ने साहित्य, कला और संस्कृति की दुनिया को जिस तरह व्यवसाय की दृष्टि से प्रतिगामी मानकर त्याग दिया है, ज्वलंत सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीर बातचीत के लिए मंच उपलब्ध कराने को फिजूल मानकर पल्ला झाड़ लिया है, वह उनके प्रतिकूल गई है। इन सामग्रियों के पाठकों की कमी नहीं है। लोग ऐसी सामग्री चाहते हैं। इस जरूरत को तमाम लघु पत्रिकाएं पूरा कर रही हैं।

   हिंदी समेत सभी भाषाओं में अनेक ऐसी पत्रिकाएं हैं, जो कविता, कहानी, संस्मरण, नाटक, समीक्षा और कला के अन्य रचनात्मक आयामों को प्रस्तुत करती रहती हैं, उन पर बात भी करती रहती हैं। राजनीति हमारे जीवन की नियंता बनी हुई है। उस पर बात होनी ही चाहिए, उसके दांव-पेच पर बात करने वाली पत्रिकाओं की भी कमी नहीं है। ऐसी पत्रिकाएं चटनी की तरह साहित्य और कला पर भी थोड़ी-मोड़ी सामग्री परोसती रहती हैं।

    एलेक्ट्रानिक मीडिया खबरों के अलावा सामाजिक, राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करता तो है, लेकिन उसकी प्रस्तुति या तो मनोरंजनात्मक होती है या फिर दर्शक संख्या बढ़ाने को लक्षित। समाज को बांटने और दरार पैदा करने वाले तमाम जटिल और लंबे समय से अनसुलझे सवालों पर आज के समय में गंभीर बातचीत की जरूरत है। हमारे अंचलों की, जनपदों की, गाँवों की बहुत उपेक्षा होती आई है, अब भी हो रही है। उनकी बातों को, उनकी समस्याओं को न अखबार जगह देते हैं, न साहित्य और राजनीति की ये पत्रिकाएं। कई बार तो उनकी ओर तब ध्यान जाता है, जब वहां से उठी लपटों की आंच राजधानियों को झुलसाने लगती हैं। हमारा मानना है कि ऐसी एक पत्रिका की जरूरत है जो इन मसलों को उठाये, जिसमें साहित्य और कला के लिए भी जगह हो और जो गंभीर सामाजिक और बुनियादी सवालों पर विमर्श का एक सशक्त मंच भी बन सके, साथ ही जो हिंदीभाषी प्रांतों के विभिन्न अंचलों और जनपदों की भी खोज-खबर ले सके।हमने पूर्व योजना में समय सरोकार नाम सोचा था, मगर समाचारों के पंजीयक द्वारा हमें अंततः समकालीन सरोकार नाम मिला है। सितंबर की शुरुआत तक समकालीन सरोकार का पहला अंक आपके सामने होगा। पर भाई यह कोई आसान काम नहीं। सबसे बड़ा संकट है इसका अर्थतंत्र। 

हमें नहीं मालूम वह कैसे बनेगा, पर न जाने क्यों एक भरोसा है कि बनेगा, जरूर बनेगा। यह भरोसा क्यों है, मैं यह भी नहीं जानता। हो सकता है आपके ही प्रयास से बात बन जाए। बिना आप की मदद के यह काम पूरा नहीं हो सकता। लेखकीय योगदान की अपेक्षा के साथ ही आप सभी मित्रों से, इसे पाने वाले, पढ़ने वाले हर किसी से मेरा आग्रह है कि हमारा भरोसा टूटने न दें। अगर कोई इसे प्रायोजित करना चाहता है या इस योजना में कोई सहभाग करना चाहता है तो वह हम लोगों से संपर्क कर सकता है।

()  सुभाष राय ( मोबाइलः 09455081894) 
() हरे प्रकाश उपाध्याय ( मोबाइलः 08756219902)

Tuesday, August 14, 2012

नमिता राकेश ग्वालियर में भाषा भारती सम्मान से सम्मानित

१२ अगस्त को ग्वालियर के चैंबर आफ कामर्स सभागार में'सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति' ने महान स्वतंत्रता सेनानी एवं पत्रकार पं० दामोदरदास चतुर्वेदी की जयंती के उपलक्ष में एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह' का आयोजन किया।

इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले कवियों में मुंबई से देवमणि पांडे,लक्षमण शर्मा वाहिद,दिल्ली से पं० सुरेश नीरव,अरविंद पथिक,पी०एन० सिंह,डा०कृष्णकांत मधुर,गाज़ियावाद से अरूण सागर,रजनीकांत राजू,मुरादाबाद से डा० मधु चतुर्वेदी ,कटनी से प्रकाश प्रलय,दमोह से प्रेमलता नीलम,लखीमपुर खीरी से श्रीकांत सिंह,अरविंद कुमार,श्रीनगर से नीरज नैथानी,राकेश जुगरान,फरीदाबाद से नमिता राकेश आदि शामिल थे परंतु कार्यक्रम की उपलब्धि थे चेन्नई से आये वरिष्ठ साहित्यकार प्रो०पी बाला सुब्रमण्यम एवं पी ०चेलम्मा।कई भाषाओं के विद्वान पी ० बाला सुब्रमण्यम की संस्कृत निष्ठ हिंदी ने सभी को मोह लिया। 

इस अवसर पर साहित्यकारों एवं पत्रकारों को भाषा-भारती सम्मान-२०१२ से अलंकृत भी किया गया।अलंकरण पाने वाली विभूतियों में मुंबई से देवमणि पांडे,लक्षमण शर्मा वाहिद,दिल्ली से पं० सुरेश नीरव,अरविंद पथिक,पी०एन० सिंह,डा०कृष्णकांत मधुर,गाज़ियावाद से अरूण सागर,रजनीकांत राजू,मुरादाबाद से डा० मधु चतुर्वेदी ,कटनी से प्रकाश प्रलय,दमोह से प्रेमलता नीलम,लखीमपुर खीरी से श्रीकांत सिंह,अरविंद कुमार,श्रीनगर से नीरज नैथानी,राकेश जुगरान,फरीदाबाद से नमिता राकेश तथा चौथी दुनिया के संपादक प्रवीण चौहान समेत कई पत्रकार भी शामिल थे। 

कार्यक्रम का संचालन डा० मधु चतुर्वेदी,स्वागत भगवान स्वरूप चैतन्य और अध्यक्षीय वक्तव्य पं० सुरेश नीरव ने दिया ।आपकी हिंदी साहित्य,हिंदी सेवियों की हीनता तथा गज़ल की दशा और दिशा एवं आवश्यकता पर टिप्पणी उत्तेजक किंतु विचारपूर्न रही।आभार रजनीकांत राजू ने व्यक्त किया।

Saturday, July 7, 2012

अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का गठन

ताशकंद। सृजन-सम्मान, छत्तीसगढ़ और प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में (सृजनगाथा डॉट कॉम, निराला शिक्षण समिति, नागपुर और ओनजीसी के सहयोग से) पांचवा अन्तरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन 24 जून से 1 जूलाई तक सपलतापूर्वक संपन्न हुआ । मुख्य आयोजन उज़्बेकिस्तान की राजधानी ऐतिहासिक शहर ताशकंद के होटल पार्क तूरियान के भव्य सभागार में 26 जून, 2012 के दिन हुआ । यह उद्घाटन सत्र बुद्धिनाथ मिश्र, देहरादून के मुख्य आतिथ्य एवं प्रवासी साहित्यकार डॉ. रेशमी रामधोनी, मारीशस की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर श्री हरिसुमन बिष्ट, सचिव, हिंदी अकादमी,दिल्ली, डॉ. शभु बादल, सदस्य, साहित्य अकादमी, डॉ. पीयुष गुलेरी, पूर्व सदस्य, साहित्य अकादमी, कादम्बिनी से जुड़े रहे वरिष्ठ पत्रकार-सम्पादक डॉ. धनंजय सिंह, वागर्थ के सम्पादक व प्रतिभाशाली युवा कवि श्री एकांत श्रीवास्तव एवं निराला शिक्षण समिति, नागपुर के निदेशक डॉ. सूर्यकान्त ठाकुर, आयोजन के प्रमुख समन्यवयक डॉ. जयप्रकाश मानस विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचस्थ थे।

मुख्य अतिथि की आसंदी से वरिष्ठ गीतकार व राजभाषा के क्षेत्र में सराहनीय कार्य करने वाले डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि संस्कृति की आवश्यकता की प्रतिपूर्ति करने वाली हिंदी भाषा का विस्तार विश्व व मानव कल्याण के लिये एक अमोघ अस्त्र बन रहा है। सभी को चुनौती दे रहा है। बाज़ार की सर्वमान्य एवं सर्वाधिक भाषा के रूप में हिंदी का जादू दुनिया के सिर चढ़ कर बोल रहा है। उन्होंने कहा कि हिंदी विश्व की सिरमौर भाषा बनने की ओर अग्रसर है। यह समारोह हिन्दी की विश्व-भाषा बनने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण कदम है। यह सिद्ध करता है कि आज हिन्दी विश्व-फलक पर सरकारी बैसाखियों के सहारे नहीं, अपने पांवों पर चलकर आगे बढ़ रही है। आज हिन्दी साहित्य केवल भारत में ही नहीं लिखा जा रहा है, बल्कि तमाम देशों में पूरी ऊर्जा से रचा जा रहा है। इस प्रकार के सम्मेलन उस विराट साहित्य को समग्र रूप में प्रस्तुत करेंगे और भारत से बाहर रहकर प्रतिकूल परिस्थितियों में सृजन करने वाले रचनाकारों का हौसला बढ़ाएंगे। उन्होंने ताशकंद में 1966 में हुए भारत-पाकिस्तान समझौता, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का स्मरण कराते हुए आव्हान किया है हमें उजबेकों से वह उपाय भी सीखना चाहिए,जिससे यह राष्ट्र अल्प अवधि में शत-प्रतिशत भ्रष्टाचार-विहीन और अपराध-मुक्त हो सका।

अध्यक्षीय उद्बोधन में मॉरीशस में महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट, भारतीय अध्ययन शाला की प्रमुख डॉ. रेशमी रामधोनी ने कहा कि तकनीकी युग में उसी भाषा का अस्तित्व बना रहेगा जो मनुष्य की जरूरतों को पूरा करती हुई तकनीकी के साथ भी सह-अस्तित्व में रहेगी। हिंदी में अन्यान्य भाषाओं और बोलियों का महासागर बनने की असंदिग्ध क्षमता है, इसे समय भी सिद्ध करता आ रहा है।

3 रचनाकारों का सम्मान

सम्मेलन में नागपुर के युवा आलोचक और नागपुर विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के अध्यापक डॉ. प्रमोद शर्मा, को प्रथम निराला काव्य सम्मान प्रदान किया गया । पुरस्कार स्वरूप उन्हें 21,000 रुपये, प्रतीक चिन्ह आदि से अलंकृत किया गया । इसके अलावा संतोष श्रीवास्तव, मुम्बई को कथालेखन एवं अहफ़ाज़ रशीद, रायपुर को इलेक्ट्रानिक पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिये सृजनगाथा सम्मान-2012 से अलंकृत किया गया।

28 कृतियों का विमोचन

5 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में एक साथ 28 साहित्यिक कृतियों का विमोचन हुआ । ये कृतियाँ हैं - श्रीमती सुमन सारस्वत, मुंबई,कथा संग्रह–मादा, डॉ. देवमणि पांडेय, मुंबई, ग़ज़ल संग्रह-अपना तो मिले कई, श्री दिनेश पांचाल, उदयपुर-कथा संग्रह–बहुरूपिये लोग, सुमन अग्रवाल, चैन्नई–ग़ज़ल संग्रह–मुझको महसूस करके देख, रेखा अग्रवाल, चैन्नई–ग़ज़ल–यादों का सफ़र, श्री हेमचन्दर सकलानी,आगरा, यात्रा संस्मरण–विरासत की खोज, डॉ. जे. आर. सोनी, रायपुर, कविता–बस्तर की कविताएं, डॉ. सरोज गुप्ता, गुडगाँव,बाल कविता संग्रह-बाल बगिया, श्री देवकिशन राजपुरोहित, जयपुर–जीवनी–मीरा बाई और मेड़ता, श्री देवकिशन राजपुरोहित, जयपुर- राजस्थानी व्यंग्य–निवान, श्रीमती उमा बंसल,दिल्ली,कविता-कुछ सच कुछ सपने, डॉ. मुनीन्द्र सकलानी, देहरादून–निबंध संग्रह–अभिव्यक्ति, श्री सुनील जाधव,नांदेड,कहानी- मैं भी इंसान हूँ, श्री सुनील जाधव, नांदेड, कविता संग्रह–मैं बंजारा,श्री सुनील जाधव, नांदेड, नाटक–सच का एक टूकड़ा, श्री मिर्जा हासम बेग, नांदेड-दक्षिनी साहित्यकार मुल्ला वजही , श्री मिर्जा हासम बेग, नांदेड,शोध धारा, डॉ. दामोदर मोरे, पुणे, कविता संग्रह– पद्य-रश्मि व सदियों के बहते जख्म, डॉ. सुजाता चौधऱी, भागलपुर–बापू और स्त्री/महात्मा का अध्यात्म/गांधी की नैतिकता, डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, कानपुर,काव्य – ओमाय तथा उपमन्यु परीक्षा, श्री भगवान सिंह भास्कर, सिवान, विविध-कसौटी, आईना बोल उठा, वृक्ष कोटर से, श्री शिव प्रकाश जैन, उदयपुर, जीवनी–युगपुरुष महाराणा प्रताप ।

6 वां सम्मेलन संयुक्त अरब अमीरात में

समारोह के प्रारंभ में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के समन्वयक, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के निदेशक व सृजनगाथा डॉट कॉम के संपादक डॉ. जयप्रकाश मानस ने स्वागत वक्तव्य देते हुए बताया कि अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में इस वर्ष से एक चयनित साहित्यकार को निराला शिक्षण समिति, नागपुर की ओर से 21 हजार रुपयेवाला निराला काव्य-सम्मान शुरु किया जा रहा है जिसकी नगद राशि अगले वर्ष से 50,000 रूपये की जा रही है । उन्होंने पिछले चारों आयोजनों के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि अगला यानी 6 वां अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन आगामी फरवरी 2013 में संयुक्त अरब अमीरात के दुबई, आबूधाबी, शारजाह में होगा ।

उक्त अवसर पर जयपुर की प्रख्यात कोरियोग्राफर सुश्री चित्रा जांगिड ने कत्थक नृत्य की प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया। 6 घंटे तक चलनेवाले मैराथनी उद्घाटन सत्र का सफलतापूर्वक संचालन प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के उपाध्यक्ष श्री अशोक सिंघई ने किया । आभार माना सृजन-सम्मान के उपाध्यक्ष एच. एस. ठाकुर ने ।

अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का गठन

सृजन-सम्मान द्वारा आयोजित होनेवाले अंतरराष्ट्रीय आयोजन के निरंतर संचालन, समन्वय और लोकव्यापकीकरण के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन’ गठन का प्रस्ताव पारित करते हुए डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र को सर्वसम्मति से प्रथम अध्यक्ष और डॉ. जयप्रकाश मानस को समन्वयक के रूप में मनोनीत किया गया । सम्मेलन के संरक्षक हैं - डॉ. गंगाप्रसाद विमल, खगेन्द्र ठाकुर, विभूति नारायण राय, विश्वरंजन, सत्यनारायण शर्मा और धनंजय सिंह ।

अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के अन्य पदाधिकारी हैं- उपाध्यक्ष- रेशमी रामधुनी (मारीशस), एकांत श्रीवास्तव (पश्चिम बंगाल), हरिसुमन विष्ट (दिल्ली प्रदेश), मीठेश निर्मोही (राजस्थान), श्रीमती संतोष श्रीवास्तव (महाराष्ट्र), डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा (विदर्भ), अशोक सिंघई (छत्तीसगढ़), सुमन अग्रवाल (तमिलनाडू), झारखंड (डॉ. प्रमोदिनी हांसदाक), शरद जायसवाल (मध्यप्रदेश), दिवाकर भट्ट (उत्तराखंड), पीयुष गुलेरी (हिमाचल प्रदेश), डॉ. महेश दिवाकर (उत्तरप्रदेश), डॉ. कामराज सिंधू (कुरुक्षेत्र), रंजन मल्होत्रा (हरियाणा), डॉ. भगवान सिंह भास्कर (बिहार) । मनोनीत राज्य समन्यवक हैं – लालित्य ललित (दिल्ली प्रदेश), आशा पांडेय ओझा (राजस्थान), डॉ. अभिज्ञात (पं. बंगाल), डॉ. देवमणि पांडेय (महाराष्ट्र), सुनील जाधव (विदर्भ), डॉ. सुधीर शर्मा (छत्तीसगढ़), डॉ. खिरोधर यादव (झारखंड), डॉ. सविता मोहन (उत्तराखंड), डॉ. ओमप्रकाश सिंह (उत्तरप्रदेश), दिनेश माली (उड़ीसा), डॉ. अशोक गौतम (हिमाचल प्रदेश), डॉ. जयशकंर बाबू (आंध्रप्रदेश), रवीन्द्र प्रभात (उत्तप्रदेश) आदि । विदेश से समन्यक हैं- पूर्णमा वर्मन (युएई), चांद हदियाबादी (डेनमार्क), प्राण शर्मा (ब्रिटेन), सुधा ओम धींगरा(अमेरिका), कुमुद अधिकारी (नेपाल), आभा मोंढे (जर्मनी) आदि । इस नवगठित संस्था के नेतृत्व में राज्य सरकारों, केन्द्र सरकार से ऐसे सम्मेलनों के लिए मिलनेवाले संभावित सहयोग भी प्राप्त किया जा सकेगा । इस समिति से दूर दराज तथा प्रवासी देशों में कार्य करनेवाले साहित्यिक संगठनों और इसके सदस्य साहित्यकारों को इस दिशा जोड़ने जोड़ा जायेगा । ताकि प्रतिवर्ष संबधित देश के किसी एक प्रतिष्ठित साहित्यकार या हिंदीसेवी या हिंदी की संस्था को सम्मानित किया जा सके । प्रतिवर्ष संबंधित देश के कवियों की एक सामूहिक कृति का प्रकाशन कर उनका रिकोग्नाईजेशन भारतीय भूमि से हो सके । इससे प्रवासी देशों में रचे जा रहे साहित्य के मुख्यधारा के मूल्याँकन में भी मदद मिलेगी । सम्मेलन में राजस्थान के प्रतिष्ठित साहित्यकारों की मांग पर राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में समादृत करने के प्रस्ताव को नैतिक समर्थन दिया गया ।

आलोचना और उत्तर औपनिवेशक समय पर विमर्श

सम्मेलन का दूसरा सत्र 'आलोचना और उत्तर औपनिवेशक समय' पर केन्द्रित रहा। सत्र में हिन्दी आलोचना और वर्तमान समय पर चर्चा करते हुए वक्ताओं ने हिन्दी आलोचना के कई महत्वपूर्ण आयामों को स्पर्श किया। सत्र की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के सदस्य, प्रसंग के संपादक व वरिष्ठ साहित्यकार शंभु बादल जी ने की। सत्र के प्रारम्भ में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए आलोचक प्रो; प्रमोद शर्मा ने कहा कि आज की आलोचना को रचनाओं के साथ आज के उत्तर औपनिवेशक समय को भी समझना होगा। आज की रचनाएं सामाजिक जटिलताओं और बदलते समय के साथ और जटिल होती चली जा रही हैं। विशिष्ट अतिथि डॉ मुनीन्द्र सकलानी ने इस विषय पर बोलते हुए कहा कि आलोचना सिर्फ रचना को स्थापित करने या निरस्त करने के लिए नहीं होनी चाहिए बल्कि इसे पूरी ईमानदारी से साहित्य को एक दिशा देने का काम भी करना चाहिए। डॉ. प्रमोदनी हंसदा ने कहा कि आज आलोचना को उन रचनाकारों की रचनाओं पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए जो केन्द्र से दूर, किसी मठ के समर्थन के बिना साहित्यिक रचनाएं दे रहे हैं। सत्र के विशिष्ट अतिथि डॉ.धनंजय सिंह ने कहा कि आज जब लेखक और पाठक के बीच जो एक खाई बनती जा रही है। उसे अच्छी आलोचना के द्वारा ही पाटा जा सकता है। किसी भी दौर में उस समय की आलोचना को दरनिनार करके साहित्य को नहीं बचाया जा सकता। सत्राध्यक्ष शंभू बादल ने कहा कि साहित्य की दुनिया विचार की दुनिया है। इसमें सहमति-असहमति स्वाभाविक है, पर इससे वैचारिक प्रवाह बना रहता है और इसे किसी भी समय में रुकना नहीं चाहिए। उन्होंने कहा कि आलोचना का काम है जो हमारी परम्परा में श्रेष्ठ है उसे बचना और आगे की पीढ़ी के लिए उसे सहेजना। आलोचना सत्र का संचालन कहानीकार विवेक मिश्र ने किया। उन्होंने अपनी टिपण्णियों में हिन्दी आलोचना के इतिहास और उसके उत्तर औपनिवेशक समय तक के सफर को श्रोताओं के समक्ष रखा। सत्र में सम्मेलन के सभी सहभागियों के साथ। वरिष्ठ साहित्यकार बुद्धिनाथ मिश्र, वागर्थ के संपादक एकांत श्रीवास्तव, सृजनगाथा के संपादक जय प्रकाश मानस तथा हिन्दी अकादमी के सचिव हरिसुमन बिष्ट जी आदि सभागार में उपस्थित थे।

भाषा और संस्कृति एक दूसरे के रचयिता

भाषा खुद संस्कृति की इकाई है और संस्कृति का रचाव और विस्तार्य भाषा में ही होता है। भाषा का संरक्षण अपने मूल में संस्कृति का ही संरक्षण है । भाषा की समाप्ति का एक अर्थ संस्कृति की समाप्ति भी है । लुप्त प्रायः भाषाओं को बचाना एक विशिष्ट संस्कृति को बचाना है । इसी तथ्यों को केंद्र में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में विमर्श का खास सत्र रखा गया था - भाषा की संस्कृति और संस्कृति की भाषा । इस सत्र के वक्ता के रूप में भारत के विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग प्रमुखों का चयन किया गया था । सत्र की अध्यक्षता की हिंदी के डॉ. महेश दिवाकर ने और विशिष्ट अतिथि थे – रेशमी रामधोनी, दिवाकर भट्ट, डॉ. केसरीलाल वर्मा । सत्र के वक्ताओं में प्रमुख थे - डॉ, ओमप्रकाश सिंह, डॉ. कामराज सिंधू, डॉ. चंदा डिसूजा, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ. जंगबहादुर पांडेय डॉ. खिरोधर यादव, डॉ. गीता सिंह, प्रभाकुमारी, डॉ. महासिंह पुनिया, डॉ. मीना कौल, डॉ. मिर्जा हासम बेग, डॉ. सुनीति आचार्य, राजेश्वर आनदेव आदि ने अपने-अपने आलेखों का पाठ किया । सत्र का संचालन किया डॉ. नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक और युवा कवि लालित्य ललित ने ।

ताशकन्द में अंतरराष्ट्रीय कथा पाठ

कहानी सत्र में भारत के विभिन्न प्रान्तों से आए कथाकारों की बारह कहानियों का वाचन हुआ। कार्यक्रम 11 बजे आरंभ हुआ । अध्यक्ष हरिसुमन बिष्ट, डॉ. मुक्ता तथा मेजर रतन जांगिड़ थे। अतिथियों के स्वागत के पश्चात कहानी सत्र आरंभ हुआ। सर्व प्रथम उत्तराखंड के जन जीवन पर आधारित हरिसुमन बिष्ट ने अपनी कहानी ‘कौसानी मेँ जैली फिश’ सुनाई । इस बेहद मार्मिक कहानी के बाद मीठेश निर्मोही ने दिल को छू लेने वाली कहानी ‘बंधन’ सुनाई, दिनेश पांचाल ने ‘मारकणिया’, सुमन सारस्वत ने ‘तिलचट्टा’, डॉ सुजाता चौधरी ने ‘चुन्नू’, डॉ. मुक्ता ने ‘आईने के पार’, विवेक मिश्र ने ‘गुब्बारा’, डॉ मृदुला झा ने ‘जन्मदिन’, प्रत्यूष गुलेरी ने ‘भेड़’, मेजर रतन जांगिड़ ने ‘भूख’, रमेश खत्री ने चोरी तथा हेमचंद सकलानी ने ‘हल्कू’ सुनाकर श्रोताओ के दिल पर गहरा असर छोडा। तीन घंटे तक चले इस सत्र का संचालन अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की महाराष्ट्र राज्य की उपाध्यक्षा व कथाकार संतोष श्रीवास्तव ने किया।

50 से अधिक कवियों ने किया कविता पाठ

पांचवे अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का मुख्य आकर्षण था उसका अंतिम सत्र जिसकी अध्यक्षता की वरिष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने और विशिष्ट अथिति थे – वागर्थ के संपादक एकांत श्रीवास्तव तथा प्रगतिशील लेखक संघ राजस्थान के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ कवि मीठेश निर्मोही । इस सत्र में शंभु बादल, डॉ. पीयूष गुलेरी, डॉ. ओमप्रकाश सिंह, लालित्य ललित, सुमन अग्रवाल, डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, रंजन मल्होत्रा, उमा बंसल, मनोज कुमार मनोज, तिलकराज मलिक, वंदना दुबे, डॉ. अर्जुन सिसौदिया, मीना कौल, शरद जायसवाल, डॉ. सविता मोहन, संजीव ठाकुर, सुनील जाधव, अरविंद मिश्रा, राजश्री झा, देवी प्रसाद चौरसिया, रामकुमार वर्मा, रवीन्द्र उपाध्याय, डॉ. प्रियंका सोनी, डॉ. जे. आर. सोनी, रेखा अग्रवाल, तुलसी दास चोपड़ा, श्रीमती चोपड़ा, सरोज गुप्ता, रामकुमार वर्मा, सुषमा शुक्ला, डॉ. अमरेन्द्र नाथ चौधरी, प्रवीण गोधेजा, सेवाशंकर अग्रवाल, विमला भाटिया, आदि ने भिन्न शिल्प, छंद और सरोकारों की कवितायें सुनायीं । कई घंटो तक चले इस सत्र का संयुक्त संचालन किया शायर मुमताज और डॉ. देवमणि पांडेय ने । उक्त अवसर पर भारत के 137 साहित्यकार, लेखक, शिक्षक, पत्रकार, ब्लागर्स सहित ताशकंद शहर से बड़ी संख्या में साहित्यिक श्रोता उपस्थित थे ।

24 जून से 1 जुलाई, 2012 तक इस 7 दिवसीय आयोजन में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन के समन्वयक डॉ. मानस, विकास मल्होत्रा, श्री एच.एस. ठाकुर, शनि चावला, मुमताज, अशोक सिंघई, रामशरण टंडन, कुमेश जैन, आदि की विशिष्ट भूमिका रही। सम्मेलन में सभी भारतीय दल के सदस्यों ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री स्कवायर जाकर सामूहिक रूप से उन्हें श्रद्धांजलि दी और समरकंद सहित उज्बेकिस्तान के महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक स्मरकों का अध्ययन-पर्यटन किया ।

(ताशकंद से एच. एस. ठाकुर की रपट)

Tuesday, June 19, 2012

पं. दामोदरदास चतुर्वेदी स्मृति सम्मान व रानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस समारोह का आयोजन


नई दिल्ली। गत् 16 एवं 17 जून को यहां भारतीय सांस्कृतिक परिषद के सौजन्य से व सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति एवं बुन्देलखंड विकास परिषद के संयुक्त तत्वावधान में दिल्ली स्थित आजाद भवन में दामोदर दास चतुर्वेदी स्मृति सम्मान एवं महारानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस समारोह का अत्यन्त सफल व प्रेरक आयोजन किया गया। दोनों दिन विभिन्न कार्यक्रमों का शुभारम्भ क्रमशः श्री दामोदर दास एवं महारानी लक्ष्मीबाई के चित्र पर पुष्प अर्पण, दीप प्रज्जवलन एवं किशोर श्रीवास्तव व साथियों के भाईचारा गीत के साथ हुआ। 

पहले दिन के साहित्यिक समारोह में जहां अनेक कवियों ने समां बांधा वहीं दूसरे दिन के समारोह का मुख्य आकर्षण रहा अंकित जैन एंड पार्टी द्वारा श्री प्रदीप जैन द्वारा लिखित गीत ‘हम बुंदेले, हम बुंदेले’ का मंचन व साहित्य कला परिषद के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत रानी झांसी पर आधारित नृत्य नाटिका। इन कार्यक्रमों ने दर्शकों का खूब मन मोहा। पहले दिन के विभिन्न कार्यक्रमों का कुशल संचालन जहाँ सर्वभाषा संस्कृति समन्वय समिति के स्थानीय प्रमुख श्री सुरेश नीरव व अरविन्द पथिक ने किया वहीं दूसरे दिन के कार्यक्रम का संचालन बुन्देलखंड विकास परिषद के पदाधिकारी श्री अवधेश चौबे ने किया। पहले दिन के समारोह के मुख्य अतिथि सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी एवं दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष डा० योगानंद शास्त्री ने भाषाओं के माध्यम से देश को जोडने पर बल दिया एवं दूसरे दिन के समारोह के मुख्य अतिथि ग्रामीण विकास राज्य मंत्री श्री प्रदीप जैन एवं समाजवादी नेता रघुठाकुर, पूर्व सांसद श्री उदय प्रताप सिंह व विधायक डॉ. एस. सी. एल. गुप्ता ने अपने भाषणों में रानी झांसी की स्मृति को ताजा करते हुए राष्ट्रीय एकता का आवाह्न करके श्रोताओं का खूब दिल जीता। 

दोनों अवसरों पर शिक्षा, प्रशासन, फिल्म, चिकित्सा, साहित्य एवं कला आदि क्षेत्रों की अनेक जानी-मानी हस्तियों को सम्मानित भी किया गया। जिनमें पहले दिन दामोदर दास स्मृति सम्मान से सर्वश्री  बी. एल. गौड, सुभाष जैन, राजकुमार सचान होरी, प्रशांत योगी, डा. प्रदीप चतुर्वेदी, प्रवीण चौहान, अशोक शर्मा, डा. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, शरददत्त, रिंद सागरी, डा. जया बंसल, कुंवर जावेद, ब्रजेंद्र त्रिपाठी, विजय आईदासानी, डा० रिचा सूद, अरूण सागर, जय कुमार रूसवा को नवाजा गया। इसी प्रकार से बुंदेलखंड विकास परिषद के प्रतिभा सम्मान से सर्वश्री डॉ. वी. के अग्रवाल, डॉ. ओ. पी. रावत, इंजि. वी. के. शर्मा, अरूण खरे, राजीव दुबे, डॉ. बी. एल. जैन, डॉ. वी. के. जैन, कामिनी बघेल एवं डॉ. अनिल जैन आदि को सम्मानित किया गया। 

दो दिनों तक चले इस समारोह में श्री किशोर श्रीवास्तव की जन चेतना कार्टून पोस्टर प्रदर्शनी ‘खरी-खरी’ भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनी रही।
 
-(हम सब साथ साथ डेस्क, नई दिल्ली से प्राप्त रपट )

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण