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Friday, October 29, 2010

दिल्ली में लघुकथा सम्मलेन संपन्न

.नई दिल्ली। हिन्दी पत्रिका ‘हम सब साथ साथ’ लघुकथा सम्मेलन किया गया जिसमें लघुकथाकारों ने अपनी श्रेष्ठ लघुकथाओं का पाठ किया और उसके पश्चात् उन्हें स्मृति चिन्ह, प्रमाणपत्र, पुस्तकें प्रदान कर एवं शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। लघुकथा पाठ एवं सम्मान हेतु चयनित वरिष्ठ लघुकथाकारों में सर्वश्री मो. मुइनुद्दीन अतहर, सनातन वाजपेयी, के. एल. दीवान, मनोहर शर्मा, देवेन्द्र नाथ शाह, सत्यपाल निश्चिंत, गणेश प्रसाद महतो, राम बहादुर व्यथित, प्रदीप शशांक, तेजिन्द्र, माला वर्मा, अकेला भाइ, शरदनारायण खरे, दिनेश कुमार छाजेड़, आरती वर्मा, गीता गीत, देवांशु पाल, ज्योति जैन, नंदलाल भारती, एम. अशफाक कादरी एवं युवा लघुकथाकारों में सर्वश्री महावीर रवांल्टा, संतोष सुपेकर, शोभा रस्तोगी, समद राही, नरेन्द्र कुमार गौड़, कैलाशचंद्र जोशी, पंकज शर्मा एवं लाल बिहारी लाल के नाम उल्लेखनीय रहे।

.आयोजन में मुख्य अतिथि थीं श्रीमती चित्रा मुद्गल। अध्यक्षता की कैपिटल रिपोर्टर के संपादक श्री सुरजीत सिंह जोबन ने । प्रतिष्ठित कथाकार श्री बलराम व व्यवसायी श्री ए. पी. सक्सेना विशिष्ट अतिथि थे । सम्मेलन की शुरुआत रेडियो सिंगर श्रीमती सुधा उपाध्याय की सरस्वती वंदना से हुई तत्पश्चात् कथाकार श्री बलराम ने लघुकथा के विकास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि लघुकथा आज विकासोन्मुख है। समारोह का सफल संचालन सर्वश्री विनोद बब्बर एवं विवेक मिश्र ने किया एवं आभार पत्रिका के कार्यकारी संपादक श्री किशोर श्रीवास्तव ने व्यक्त किया।

(दिल्ली से सांस्कृतिक प्रतिनिधि की रिपोर्ट )

Tuesday, October 26, 2010

मुक्तिबोध की कर्मस्थली में रचना शिविर का आयोजन,प्रविष्टियाँ आमंत्रित


रायपुर । रचनाकारों की संस्था, प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ देश के उभरते हुए कवियों/लेखकों/निबंधकारों/कथाकारों/लघुकथाकारों/ब्लॉगरों को देश के विशिष्ट और वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा साहित्य के मूलभूत सिद्धातों, विधागत विशेषताओं, परंपरा, विकास और समकालीन प्रवृत्तियों से परिचित कराने, उनमें संवेदना और अभिव्यक्ति कौशल को विकसित करने, प्रजातांत्रिक और शाश्वत जीवन मूल्यों के प्रति उन्मुखीकरण तथा स्थापित लेखक तथा उनके रचनाधर्मिता से तादात्मय स्थापित कराने के लिए अ.भा.त्रिदिवसीय/रचना शिविर (18, 19, 20 दिसंबर, 2010) सृजनात्मक लेखन कार्यशाला का आयोजन विश्वकवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कार्यस्थली(त्रिवेणी परिसर), राजनांदगाँव में किया जा रहा है । इस अखिल भारतीय स्तर के कार्यशाला में देश के 75 नवोदित/युवा रचनाकारों को सम्मिलित किया जायेगा ।

संक्षिप्त ब्यौरा निम्नानुसार है-
प्रतिभागियों को 20 नवंबर, 2010 तक अनिवार्यतः निःशुल्क पंजीयन कराना होगा । पंजीयन फ़ार्म संलग्न है ।
प्रतिभागियों का अंतिम चयन पंजीकरण में प्राप्त आवेदन पत्र के क्रम से होगा ।
पंजीकृत एवं कार्यशाला में सम्मिलित किये जाने वाले रचनाकारों का नाम ई-मेल से सूचित किया जायेगा ।
प्रतिभागियों की आयु 18 वर्ष से कम एवं 45 वर्ष से अधिक ना हो ।
प्रतिभागियों में 5 स्थान हिन्दी के स्तरीय ब्लॉगर के लिए सुरक्षित रखा गया है ।
प्रतिभागियों को संस्थान/कार्यशाला में एक स्वयंसेवी रचनाकार की भाँति, समय-सारिणी के अनुसार अनुशासनबद्ध होकर कार्यशाला में भाग लेना अनिवार्य होगा ।
प्रतिभागी रचनाकारों को प्रतिदिन दिये गये विषय पर लेखन-अभ्यास करना होगा जिसमें वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा ।
कार्यशाला के सभी निर्धारित नियमों का आवश्यक रूप से पालन करना होगा ।
प्रतिभागियों को सैद्धांतिक विषयों के प्रत्येक सत्र में भाग लेना अनिवार्य होगा । अपनी वांछित विधा विशेष के सत्र में वे अपनी इच्छानुसार भाग ले सकते हैं । प्रतिभागियों के आवास, भोजन, स्वल्पाहार, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह की व्यवस्था संस्थान द्वारा किया जायेगा ।
प्रतिभागियों को कार्यशाला में संदर्भ सामग्री दी जायेगी ।
प्रतिभागियों को अपना यात्रा-व्यय स्वयं वहन करना होगा ।
प्रतिभागियों को 17 दिसंबर, 2010 दोपहर 3 बजे के पूर्व कार्यशाला स्थल –त्रिवेणी परिसर/सिंधु सदन, जीई रोड, राजनांदगाँव, छत्तीसगढ़ में अनिवार्यतः उपस्थित होना होगा । पंजीकृत/चयनित प्रतिभागी लेखकों को कार्यशाला स्थल (होटल) की जानकारी, संपर्क सूत्र आदि की सम्यक जानकारी पंजीयन पश्चात दी जायेगी ।
संपर्क सूत्र
जयप्रकाश मानस
कार्यकारी निदेशक
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा, रायपुर, छत्तीसगढ – 492001
ई-मेल-pandulipipatrika@gmail.com
मो.-94241-82664
पंजीयन हेतु आवेदनपत्र नमूना
01. नाम -
02. जन्म तिथि व स्थान (हायर सेंकेंडरी सर्टिफिकेट के अनुसार) -
03. शैक्षणिक योग्यता –
04. वर्तमान व्यवसाय -
05. प्रकाशन (पत्र-पत्रिकाओं के नाम) –
06. प्रकाशित कृति का नाम –
07. ब्लॉग्स का यूआरएल – (यदि हो तो)
08. अन्य विवरण ( संक्षिप्त में लिखें)
09. पत्र-व्यवहार का संपूर्ण पता (ई-मेल सहित) –

हस्ताक्षर


(रायपुर से राम पटवा की रपट)

Monday, October 25, 2010

अब नेट पर ले सकेंगे नवगीत का भी आनंद


शिव मंदिर सभागार में साहित्यिक इंटरनेट पत्रिका
का लोकार्पण करते माहेश्वर तिवारी व् बुद्धिनाथ मिश्र

मुरादाबाद : नवगीत के रस सभी को लुभाते हैं। गीतों के साथ अक्सर हम भी जुगलबंदी करने लगते हैं। आमतौर पर हमें पसंदीदा गीत नहीं मिल पाते। गीत-संग्रह की किताबें महंगी होने के कारण आम पाठक इस सुखद अनुभूति से वंचित रह जाते हैं तो कई बार पसंदीदा कवियों की किताबें नहीं मिल पाती। गीत प्रेमियों को परेशान होने की जरूरत नहीं। अब घर बैठे गीतों का आनंद ले सकेंगे। नेट पर साहित्यिक पत्रिकाएं तो कई हैं लेकिन गीत विधा की पत्रिकाएं न के बराबर हैं। गीतों को विश्व पटल पर स्थान दिलाने की तैयारी है। इस पुनीत कार्य को पूरा करने का बीड़ा मुरादाबाद के साहित्यकारों ने उठाया है।

24 अक्टूबर को गीत-पहल का विमोचन

साहित्यिक ई-पत्रिका गीत-पहल का शिव मंदिर सभागार हिमगिरि कालोनी में लोकार्पण किया गया। इस पत्रिका में अभी तक देशभर के 52 गीतकारों के नवगीत सम्मिलित किए गए हैं। इसमें विशिष्ट रचनाकार, उनकी रचनाओं, संस्मरण, साक्षात्कार, समीक्षा, मत-मतांतर, साहित्यिक हलचल आदि का समावेश किया गया है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि साहित्यकार डा.बुद्धिनाथ मिश्र, विशिष्ट अतिथि डा.महेश दिवाकर और शचींद्र भटनागर ने इस कदम की सराहना की। संपादक मंडल सदस्य अवनीश सिंह चौहान ने बताया कि गीत-पहल पूरी तरह गीत और नवगीत को समर्पित ई-पत्रिका है। योगेंद्र वर्मा व्योम ने इस कोशिश का मकसद गीतों को विश्र्व पटल पर स्थान दिलाना बताया। अध्यक्षता माहेश्र्वर तिवारी ने एवं संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया। इस मौके पर आयोजित काव्यपाठ की रसधार में हर कोई डूब गया। वीरेंद्र सिंह बृजवासी ने जाति से कब कर्म निर्धारण हुआ, कर्म से ही जाति का निर्धारण हुआ, जो जिया इस सत्य के विपरीत जाकर, वही सबके कष्ट का कारण हुआ का पाठ कर जातीय वैमनस्यता को दूर करने की कोशिश की। मूलचंद राज ने जब भी उलझन में होता हूं याद बहुत आती है मां, चाहे जैसी भी उलझन हो चुटकी में सुलझाती मां का पाठ कर वात्सल्य का बोध कराया। इसके अलावा सतीश सार्थक, परवाना, डा. ऋचा निखिल, रामदत्त द्विवेदी, डा. ओमाचार्य, जितेंद्र कुमार जौली, यशपाल सिंह खामोश, नत्थूलाल शर्मा, डा. मीना नकवी, निखिलेश कुमार पाठक, योगेंद्र पाल सिंह विश्नोई, रघुराज सिंह निश्चल, मनोज वर्मा, शिशुपाल मधुकर, विवेक निर्मल आदि ने काव्यपाठ किया। आनंद कुमार गौरव ने आभार व्यक्त किया।
(मुरादाबाद से अवनीश सिंह चौहान की रिपोर्ट )

Thursday, October 21, 2010

बाबा नागार्जुन की जन्मशती पर आयोजित संगोष्ठी संपन्न



रांची। बाबा नागार्जुन की जन्मशती पर रांची दूरदर्शन द्वारा आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी 'नागार्जुन का रचना संसार के पहले दिन सीसीएल के विचार कक्ष में रचना और कविताओं को लेकर लंबी चर्चा चली। वरीय पत्रकार हरिवंश से लेकर शीन अख्तर, अरुण कमल, विश्वनाथ त्रिपाठी, विजय बहादुर सिंह, मदन कश्यप, रामदयाल मुंडॉ, वीपी केशरी, रविभूषण, विष्णु नागर सहित दर्जनभर से ऊपर कवि-समालोचकों ने नागार्जुन के रचना संसार पर हर ओर-छोर से दृष्टि डॉली। शीन अख्तर ने शुरुआत की और बहस की ज़मीन हरिवंश ने तैयार की। कहा, साहित्य-संस्कृति के बिना कारपोरेट कंपनियां भी नहीं चल सकतीं। इसके बाद दिल्ली से आए वरिष्ठ आलोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कई कोणों से नागार्जुन को देखने की कोशिश की। बताया कि वे जनकवि थे। उनकी प्रतिबद्धता आम जनता के प्रति थी। अध्यक्षता करते हुए 'आलोचना’ के संपादक व कवि अरुण कमल उनकी कविता, यात्रावृत्तांत, उपन्यास आदि पर चर्चा करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया कि बाबा का संपूर्ण साहित्य संघर्ष की भूमि पर खड़ा है।


बताया, सरहपा से होते हुए कबीर, नज़ीर अकबराबादी, मुकुटधर पांडेय, निराला के नए पत्ते की पूरी परंपरा नागार्जुन में मौज़ूद है। कमल ने बहुत विस्तार से अपने विचार रखते हुए उनकी संस्कृत, बांग्ला, मैथिली कविताओं की प्रासंगिकता उद्धरण के साथ रेखांकित की। उन्होंने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि वे हिंदी के ऐसे जादूगर हैं, जहां भाषा के कई रूप मौज़ूद हैं। तुम खिलो रात की रानी और मंत्र कविता से लेकर बाक़ी बच गया अंडॉ तक...।

निष्कर्ष यह कि वे निरंतर प्रतिपक्ष के कवि थे। कमल ने उनके उपन्यास बलचनमा के बारे में बताया कि इसमें गोदान से आगे की कथा है, जहां भूमिहीन खेतिहर मज़दूर हैं। बाबा बटेसर नाथ, जमनिया क बाबा की भी चर्चा की। पहले सत्र का संचालन नाटककार विनोद कुमार ने किया।

दूसरा सत्र नागार्जुन की कविताओं को समर्पित था। रविभूषण ने विषय प्रवर्तन किया। अपने 40 मिनट के व्याख्यान में नागार्जुन के अड़सठ सालों की रचनायात्रा की चर्चा करते हुए कहा कि नागार्जुन की कविताओं के कई पाठ हो सकते हैं। दलित, स्त्री, आदिवासी, उत्तर आधुनिक आदि-आदि। किसी ने प्रश्न उठाया था कि झारखंड में नागार्जुन क्यों? रविभूषण ने बड़ा सटीक जवाब दिया। कहा, नागार्जुन ने मुंडॉ, उरांव को तब याद किया जब उनकी चर्चा कहीं नहीं थी। पद्मश्री डॉ. रामदयाल मुंडॉ ने राहुल के बाद नागार्जुन को सबसे बड़ा यायावर बताया।

मौक़े पर एक मुंडॉरी गीत भी सुनाया, जिसका आशय था सब एक हैं। सबको समन्वित करो। भोपाल से आए ओम भारती ने परंपरा और आधुनिकता के बरक्स उनकी कविताओं को देखा-परखा। वहीं, कवि व द पब्लिक एजेंडॉ के साहित्य संपादक मदन कश्यप ने व्यापक जन सरोकारों का उल्लेख किया। मुंबई से आए आलोचक विजय कुमार ने नागार्जुन को फकीर और साधु कहा। कई तरह के अंत की घोषणा के बरक्स विजय ने नागार्जुन की कविताओं को समझने की कोशिश की। बीपी केशरी ने हिंदी कवियों और आलोचकों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि आप गरीबों पर भी नज़र डॉलिए। नागार्जुन की परंपरा को आगे बढ़ाइए।

'वागर्थ’ के संपादक व विशिष्ट अतिथि विजय बहादुर सिंह, जो बाबा के बहुत निकट रहे हैं, बहुत स्पष्ट कहा कि बाबा को कवि-लेखक के दायरे से बाहर निकल कर देखने की ज]रूरत है। किताबी तौर पर बाबा को नहीं देखा जा सकता। इससे हम खंडित नागार्जुन को देख पाएंगे। समग्र रूप से देखने के लिए उनकी हर कविता को पढ़ा जाना चाहिए। अध्यक्षीय उद्बोधन विष्णु नागर ने दिया। इस सत्र का संचालन माया प्रसाद ने किया। इसके पूर्व सभी अतिथियों को पुष्पगुच्छ व शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।
(रांची से संजय कृष्ण की रपट )

Tuesday, October 19, 2010

समकालीन कविताओं पर प्रदर्शनी


श्रीडूँगरगढ़ । राजस्थान के समकालीन हिन्दी कवियों की कविताओं को रंग तूलिका के माध्यम से अभिव्यक्ति देती राज बिजारणिया की कविता पोस्टर प्रदर्शनी ‘वितान’ को देख कर दर्शक अभिभूत हो गये । अवसर था राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर एवं राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, श्रीडूँगरगढ द्वारा आयोजित प्रांतीय लेखक सम्मेलन का और स्थान था ओसवाल पंचायत भवन । श्रीडूँगरगढ महाविद्यालय की हिन्दी व्याख्याता अंजली पारीक और चूरू के युवा रचनाकार दुलाराम सहारण द्वारा लोकार्पित इस प्रदर्शनी में प्रदेश के लगभग 25 कवियों की कविताओं को पैंटिग्स के साथ आकारित कर प्रदर्शित किया गया ।


.एक शब्दशिल्पी के अंतरंग को, उसके मनोभावों को एक चित्रकार किस रूप में देखता, रचता और अभिव्यक्त करता है, यही आधार फलक लेकर लूणकरणसर के युवा कवि राजूराम बिजारणिया ने इस प्रदर्शनी के ‘इवेंट’ का ताना-बाना बुना । प्रदर्शित पैंटिग्स की जीवंतता से गहरे तक प्रभावित दूरदर्शन जयपुर के निदेशक हरीश करमचंदानी ने इसे एक बेहद ख़ूबसूरत प्रयास बताते हुए बिजारणिया के कला कर्म की प्रशंसा की । सुप्रसिद्ध समालोचक डॉ. हितेश व्यास ने सम्बन्धित कविताओं को संप्रेषणीय बनाने में समर्थ प्रयास बताया । युवा साहित्यकार रवि पुरोहित ने इसे देह की धड़कन की संज्ञा दी ।

.कविता पोस्टर प्रदर्शनी में श्री हरीश भादानी की ‘रेत है रेत बिफर जाएगी’, कन्हैयालाल सेठिया की ‘निराकार’, नंदकिशोर आचार्य की ‘हरे में झरता है’, प्रीता भार्गव की ‘माँ’, मोहम्मद सद्दीक की ‘आदमी है नाम’, डॉ. कविता किरण की ‘कब तलक काबा’ओ काशी जायेगा’, चन्द्रकांत देवताले ‘आकाश की जात बता भईया’, श्याम महर्षि की ‘रोटी’, रवि पुरोहित की आँखें: परिणति’, डॉ. मदनगोपाल लढा की ‘छोरी’, ओम पुरोहित ‘कागद’ की ‘काळीबंगा’, डॉ. मदन सैनी की ‘जंबूरे’, प्रमोद शर्मा की ‘घुड़सवार है मृत्यु’, सत्यनारायण सोनी की ‘सूरज नहीं देखा’, विनोद स्वामी की ‘कुछ तो सोच’, डॉ. कृष्णा रावत की ‘प्यार और आस’, मदन धतरवाल की ‘रम्म से जो प्यार करे’ सहित कई समकालीन हिन्दी कवियों की कविताओं को सचित्र प्रदर्शित किया गया ।

(बीकानेर से रवि पुरोहित की रपट)

Monday, October 11, 2010

हिन्दी ब्लॉगिंग पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी पूरी भव्यता के साथ संपन्न


महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में दिनांक ०९.१०.२०१० को 'हिंदी ब्लॉगिंग की आचार-संहिता' विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला एवं संगोष्ठी का उद्‍घाटन विश्वविद्यालय के श्री विभूति नारायण राय ने किया। कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत कार्यक्रम के संयोजक श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने किया ।



अपने स्वागत भाषण में विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति श्री ए. अरविंदाक्षण ने कहा कि "इस कार्यक्रम में यूजीसी और मानव संसाधन विकास के प्रतिनिधियों/अधिकारियों को भी आमंत्रित करना चाहिए, जिससे वे जान सकें कि ये विश्वविद्यालय केवल साहित्यधर्मिता और उत्सव का ही केंद्र नहीं है, बल्कि यह हिंदी को दुनिया की सबसे नवीनतम तकनीक से भी जोड़ने हेतु प्रयासरत है।"


कुलपति श्री विभूति नारायण राय ने अपने उद्‍घाटन वक्तव्य में कहा कि "इंटरनेट ने राज्यों की बंदिशों को तोड़ दिया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में यह जो विस्फोट हुआ है, वो इंटरनेट से ही संभव हो सका है। लेकिन हम यहाँ 2 दिनों के लिए इसलिए भी उपस्थित हुए हैं कि हम इस बात पर बहस कर सकें कि इस माध्यम ने हमें एक खास तरह की स्वच्छंदता तो नहीं दे दी है! अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कहीं हम यह तो नहीं भूल रहे हैं कि हम सारी सीमाएँ तोड़ रहे हैं और दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचा रहे हैं। कहीं हम तथ्यों को तोड़-मरोड़कर तो नहीं पेश कर रहे हैं। हमें ऐसा लगता है कि हर एक ब्लॉगर को अपनी लक्ष्मण-रेखा खुद बनानी होगी

"

विषय-प्रवर्तन जोधपुर, राजस्थान से पधारीं प्रसिद्ध साहित्यकार और ब्लॉगर डॉ. अजित गुप्ता ने किया। अध्यक्षता डॉ. ऋषभ देव शर्मा ने की।
इनके अतिरिक्त मंच पर वरिष्ठ कवि श्री आलोक धन्वा, जनसंचार विभाग-प्रमुख श्री अनिल राय तथा प्रमुख ब्लॉगर और अप्रवासी कवयित्री डॉ। कविता वाचक्नवी आदि उपास्थित थे।

अजित जी को विषय प्रवर्तन के लिये बुलाया गया है। उन्होंने कहा कि वे ब्लॉगर हैं और त्वरित विचार ही ब्लॉगिग में पेश करती हैं। इसके बाद वे पढ़कर अपनी बात कह रही हैं और विषय परिवर्तन कर रही हैं। उनका कहना है कि अपने ऊपर हमको अपने आप संयम रखना चाहिये।

प्रसिद्द कवियित्री और ब्लोगर सुश्री कविता वाचकनवी ने आचार संहिता की आवश्यकता क्यों है पर खुलकर अपने विचार रखें और कहा कि आने वाले समय में आचार संहिता की आवश्यकतायें बढ़ेंगी।
इस अवसर पर प्रख्यात कवि और संस्कृतिकर्मी श्री आलोक धन्वा ने ब्लॉगिंग को विस्मय कारी विधा बताया।श्री आलोक धन्वा ने ब्लॉगिंग की तुलना रेल के चलन से करते हुये बताया कि शुरुआत में जैसे रेल यात्रा करने से लोग डरते थे लेकिन आज यह हमारी आवश्यकता बन गयी है वैसे ही शायद अभी ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर में इसके प्रति हिचक है लेकिन आने वाले समय में यह जन समुदाय की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकती है।

उपरोक्त सभी वक्ताओं के साथ-साथ इस अवसर पर फ़ुरसतिया ब्लॉग के संचालक श्री अनूप शुक्ल और भड़ास ब्लॉग के कर्ता-धर्ता श्री यशवंत सिंह ने भी अपने विचार व्यक्त किये । ब्लॉगिंग को अद्भुत विधा बताते हुये बताते हुये श्री अनूप शुक्ल ने कहा कि लोग यहां की अच्छाई देखने के बजाय इसकी बुराइयों का रोना रोते हैं। यह अकेला ऐसा माध्यम है जिसमें त्वरित दुतरफ़ा संवाद संभव है। ब्लॉग एक तरह से रसोई गैस की तरह है जिस पर आप हर तरह का पकवान बना सकते हैं। साहित्य,लेखन, फोटो, वीडियो, आडियो हर तरह की विधा में इसमें अपने को अभिव्यक्त कर सकते हैं।


कार्यक्रम के अध्यक्ष श्रीॠषभ देव ने सभी वक्ताओं के विचारों का संक्षिप्त अंश पेश करते हुये अपनी बात कही। उन्होंने नैतिकता, बेनामी ब्लॉगर और अन्य मसलों पर अपने विचार व्यक्त किये। बेनामी ब्लॉगरों के बारे में अपनी राय व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा –बेनामी बड़े-बड़े काम करते होंगे मैं उनका अभिनंदन करता हूं। लेकिन इसको नियम नहीं बनाया चाहिये। मेरे परिचय क्षेत्र में कई लोग हैं जिन्होंने अपने सूचनायें झूठी दी हैं। पाखंड हर जगह निंदनीय है। ब्लॉगिंग कोई खिलवाड़ नहीं है। यह नैतिक कर्म है(नित्य कर्म नहीं ) बच्चों बताते हैं कि उनसे कोई पूछता नहीं है। वरिष्ठ और कनिष्ठ न भी माने तो अनुभवी और कम अनुभवी का अन्तर तो रहेगा ही। मेरी चिंता का कारण बच्चे हैं जो झूठी पहचान बनाकर गलत हरकतें कर रहे हैं।

संचार विभाग के श्री अनिल कुमार राय ने धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा -जहां आधुनिक संचार माध्यम समाप्त होते हैं वहां से इसकी शुरुआत होती है। यदि हम टिप्पणियों को माडरेशन करने लगे तो फ़िर यह तो एक संपादक की उपस्थिति ही हुई।


दूसरे सत्र में विश्वविद्यालय द्वारा पंजीकृत प्रतिभागियों को श्री शैलेश भारतवासी तथा श्री संजय विगानी ने प्रशिक्षित किया और उन्हें ब्लोगिंग के गुर सिखाये ।
दोपहर के खाने के बाद चार ग्रुप बना दिये हैं। ये चार ग्रुप ब्लॉगिंग पर चर्चा करके कल अपनी प्रस्तुति करेंगे। इस ग्रुप में देश के विभिन्न शहरों से पधारे ब्लोगरों में प्रमुख परिकल्पना समूह के संचालक-समन्वयक श्री रवीन्द्र प्रभात, तस्लीम के संचालक श्री जाकिर अली रजनीश, नुक्कड़ सहित लगभग आधा दर्जन चर्चित ब्लॉग के स्वामी श्री अविनाश वाचस्पति, भड़ास ब्लॉग के सचालक श्री यसवंत सिंह, कोटा राजस्थान से पधारी श्रीमती अजित गुप्ता, मुम्बई से पधारी श्रीमती अनिता कुमार, कोलकाता से पधारे श्री प्रियंकर पालीवाल, अमेरिका से पधारी सुश्री कविता वाचकनवी, कानपुर से पधारे श्री अनूप शुक्ल,मेरठ से पधारे श्री अशोक कुमार मिश्र, छतीसगढ़ से पधारे डा महेश सिन्हा, संजीत त्रिपाठी, दिल्ली से पधारे श्री जय कुमार झा, इंदौर से पधारी सुश्री गायत्री शर्मा, पानीपत से पधारे श्री विवेक सिंह, उज्जैन से पधारे श्री सुरेश चिपलूनकर ,राजस्थान से पधारे श्री संजय वेगानी,इलाहाबाद से पधारे श्री हर्षवर्द्धन, दिल्ली से पधारे श्री शैलेश भारतवासी और श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, रचना त्रिपाठी आदि से चार गुप बनाए गए ।

चारो ग्रुप से एक-एक प्रतिनिधियों को ब्लोगिंग एथिक्स पर चर्चा हेतु प्रतिनियुक्त किया गया जिसमें सर्वश्री रवीन्द्र प्रभात, श्री सुरेश चिपलूनकर, श्री हर्षवर्द्धन, श्री अविनाश वाचस्पति, सुश्री गायत्री शर्मा , श्री अशोक कुमार मिश्र आदि थे ।
सायं ०७ बजे से अन्तराष्ट्रीय छात्रावास में श्री आलोक धन्वा की अध्यक्षता में काव्य पाठ हुआ जिसमें लगभग सभी ब्लोगर ने भाग लिया । कविता सत्र के बाद लखनऊ के रहने वाले रवि नागर जी के द्वारा महाप्राण निराला, अज्ञेय, शमशेर आदि की कविताओं की संगीतवद्ध प्रस्तुति की गयी ।

दूसरे दिन सुबह ०७ बजे सभी आगंतुक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की सेवा स्थली सेवाग्राम और आचार्य बिनोबा भावे की ताप:स्थलि पवनार आश्रम गए और वहां की शूक्ष्म गतिविधियों का विश्लेषण किया ।


सुबह ०९ बजे आश्रम से वापस आने के पश्चात दूसरे सत्र का आरंभ हुआ । दूसरे सत्र में प्रस्तुति के क्रम में महाजाल ब्लॉग के संचालक श्री सुरेश चिपलूनकर ने कहा कि -"दूसरे के ब्लाग पर टिप्पणी करना सबसे अच्छा तरीका ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिये। तत्थात्मक बातें लिखनी चाहिये। सामग्री स्रोत का लिंक देना चाहिये।



माडरेटर के बारे में उन्होंने बताया कि विरोधी बातों का शालीलना से जबाब देना चाहिये। बहुत गुस्सा आये तो आप साले की जगह भाईसाहब शब्द का इस्तेमाल करते हुये कह सकते हैं- भाई साहब आप बहुत हरामी हैं। "
इसके बाद इलाहाबाद से पधारे श्री हर्षवर्द्धन ने कहा कि "आप जो भी लिखें पूरी बात पक्की जानकारी से लिखे। उन्होंने विस्फ़ोट,मोहल्ला,भड़ास, अर्थकाम।काम का उदाहरण देते हुये बताया इन ब्लाग में उद्यमिता के माडल के रूप में लिया जाना चाहिये। हम समय और आवश्यक्ता के अनुरूप के साथ बदलते हैं। आज यशवंत सिंह उतने ही आक्रामक नहीं हैं जितने शुरुआती दिनों में थे। वे आज ज्यादा समझदार से हुये हैं। यह वित्तीय जरूरत से पैदा यह समझ है। और ब्लागिंग अनामी ब्लागर के बारे में अपनी राय रखते हुये हर्षवर्धन ने कहा कि व्यक्तिगत हिसाब निपटाने के लिये बेमानी ब्लाग लिखना अनुचित है लेकिन जनहित में संस्थागत लड़ाइयां लड़ने के लिये बेनामी की आवश्यकता पड़ सकती है। उनका मानना है कि ब्लाग पर विश्वनीयता बनाये रखे के लिये खबरें तथ्यात्मक होनी चहिये।"

इसके बाद जब लखनऊ से पधारे श्री रवीन्द्र प्रभात ने चिट्ठा संहिता क्यों, किसके लिए और कसे ? विषय पर आधारित अपने वक्तव्य प्ररित किया तो सभागार में उपास्थित श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए । उन्होंने दस विन्दूओं के माध्यम से पूरे ब्लॉग जगत की दिशा, दशा और दृष्टि पर विहंगम दृष्टि डालते हुए कहा कि -"जब कोई परिवार अथवा समाज बड़ा स्वरुप लेने लगता है, तो वहां कुछ अवांछित लोगों की सक्रियता भी बढ़ने लगती है ! ऐसे में समाज के जिम्मेदार लोगों का यह कर्त्तव्य बनता है कि समाज को विसंगतियों और विभेद से दूर रखा जाए ! यही वह कारण है जब हमें ब्लोगिंग इथिक्स पर बात करने की आवश्यकता महसूस हो रही है !कुल मिलाकर कहा जाए तो यही कहा जा सकता है कि हिंदी चिट्ठाकारिता का भविष्य उज्जवल है और आने वाले दिनों में अंग्रेजी की तरह इसका भी एक बड़ा और समृद्ध संसार होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है ! जरूरत केवल इस बात की है सकारात्मक लेखन को बढ़ावा दिया जाए और नकारात्मक लेखन को महत्व न दिया जाए, क्योंकि हिंदी चिट्ठाकारिता में ऐसे लोगों की तादाद अधिक है जो घबराहट और कम आत्मविश्वास की वजह से अपने अनुभवों को साझा करने से डरते हैं कि कहीं कोई हिंदी ब्लॉगजगत का तथाकथित मठाधीश नाराज न हो जाए ! हमें इस ओर विशेष ध्यान देना होगा !

उन्होंने एक सार्गाभित तथ्य प्रस्तुत करते हुए कहा कि आप रातो रात अपनी पत्नी को नहीं बदल सकते, अपने बच्चों को नहीं बदल सकते , अपने सहयोगियों/सहकर्मियों अथवा मित्रों को नहीं बदल सकते मगर स्वयं को बदल सकते हैं ...कोशिश करके देखिये आप बदलेंगे तो अपने आप चिट्ठाकारों का यह समूह भी बदल जाएगा । "
इस अवसर पर दिल्ली से पधारे श्री अविनाश वाचस्पति ने कहा कि आचार संहिता की बात अगर न भी मानें तो मन की बात माननी चाहिये और ऐसी बातें करने से बचना चाहिये जिससे लोगों को बुरा लग सकता है।


श्री प्रवीण
पाण्डेय ने राजा बेटा की तरह अपना और अपने ब्लॉग का परिचय देते हुये दुविधा जाहिर की वे उन लोगों के सामने अपनी बात कहने आये हैं जिनको पढ़ते हुये उन्होंने ब्लॉगिंग शुरु की। इसे वे अपना सम्मान समझे या यह कि उनको कठिन इम्तहान में खड़ा कर दिया गया है। श्रीप्रवीण ने अपनी ब्लाग यात्रा के बारे में बताया कि टिप्पणियों और वुधवासरीय पोस्ट से शुरु कर के वे अब अपने ब्लाग पर लिखने लगे हैं- न दैन्यम न पलायनम।"
हिंदी ब्लोगिंग विषय की शोध छात्रा और नयी दुनिया दैनिक की उप संपादक सुश्री गायत्री शर्मा ने अपने ग्रुप का प्रस्तुतिकरण करते हुये ब्लागिंग की सामाजिक उपयोगिता पर समूह के विचार पेश किया। उन्होंने सुनामी ब्लॉग का उदाहरण देते हुये ब्लॉग की सामाजिक उपयोगिता के बारे में अपनी बात कही।


अंत में भड़ास ब्लॉग के संचालक श्री यशवंत सिंह ने चिट्ठाकारी में अपने anuकहा कि "हम हिंदी पट्टी के लोग अतियों में जीते हैं। या तो हम अराजक हो जाते हैं या फ़िर बेहद भावुक। अंग्रेजी के लोग तार्किक होते हैं इसलिये वे गाली और गप्प को कम तथ्य को ज्यादा तरजीह देते हैं। हम हिंदी वाले गाली और गप्पों पर ज्यादा ध्यान देते हैं, तथ्य पर कम। यशवंत ने अपनी यादों का जिक्र करते हुये यह कहा कि शायद पिछले समय में उन्होंने भी एक आम हिंदी ब्लॉगर की तरह अतियों पर रहते हुये तमाम बेवजह बातें और दूसरों को दुख पहुंचाने वाली पोस्टें लिखीं। लेकिन अब समय के साथ हमारी सोच में बदलाव आया है और अब वे इस तरह की दूसरों को दुख पहुंचाने वाली बेवजह पोस्टें लिखना बंद कर दिया है। "
इसके बाद समापन सत्र की शुरुआत हुई । इस सत्र में भोपाल के प्रसिद्दऔर चर्चित ब्लोगर श्री रवि रतलामी के द्वारा "टौरके नवीनतम प्रयोग और ब्लोगिंग के आवश्यक पहलूओं पर टेली कॉन्फ्रेसिंग के जरिये अपनी बात रखी गयी जिसे उपास्थित श्रोताओं के द्वारा काफी सराहा गया ।

पहली बार किसी ब्लोगर संगोष्ठी में क़ानून के जानकारश्री पवन दुग्गल ( दिल्ली हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट में साईबर लौ के ज्ञाता ) उपस्थित हुए और उन्होंने ब्लोगिंग से संबंधित आचार-संहिता के उल्लंघन पर संविधान की धाराओं तथा उपधाराओं की जानकारी दी ।
इस अवसर पर श्रीमती अजीत गुप्ता की लघुकथा के संग्रह का लोकार्पण श्री विभूति नारायण राय के द्वारा किया गया, तत्पश्चात नए चिट्ठाकारों से मुखातिव होते हुए श्री जाकिर अली रजनीश ने कहा कि नए ब्लोगर को विषय आधारित ब्लॉग के बारे में बताया जाना चाहिए इससे जागरूकता बढ़ेगी । इस अवसर पर विश्वविद्यालय का एक सामूहिक ब्लॉग प्रीति सागर के नेतृत्व में तैयार किया गया जिसका लोकार्पण विश्वविद्यालय के कुलपति ने किया ।

अंत में विश्वविद्यालय के कुलपति श्री विभूति नारायण राय के द्वारा सभी आगंतुकों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया ।

(वर्धा से शब्द सभागार हेतु सांस्कृतिक प्रतिनिधि की रिपोर्ट के आधार पर )

Sunday, October 3, 2010

हम सबको अपने देश की लाज रखनी हैं : दीपक शर्मा


बुज़ुर्ग कहते हैं कि बिना आखों देखी बात का भरोसा करना और उस पर अपनी राय कायम कर लेना आदमी की सबसे बड़ी बेबकूफी होती है .हिन्दुस्तानी समाज में एक कहावत कम से कम बच्चा होश सम्हालने के तुरंत बाद सुनना शुरू कर देता है, वो है " कान पर कभी विश्वास मत करो या सुनी -सुनाई बातों का भरोसा कभी मत करो . लेकिन हम भारतीय इन बातों को सिर्फ दूसरों पर इस्तेमाल करने के लिए ही सुनते हैं.अपनी असल ज़िन्दगी में इन पर अमल करने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

एक और चीज़ में हमे महारत हासिल है वो है किसी की भी बखिया उधेड़ने की.चाहें कोई भी विषय हो ,कैसा भी मुद्दा हो,किसी का भी ज़नाज़ा निकालने का हमे विरासत में मिला हुनर है. हम बहुत ही सहेजता से अपनी बात को लोगों तक पहुँचाने का लोभ त्याग नहीं पाते और चाँद की चांदनी की प्रशंसा करने की वजाय उसके धब्बे देखना पसंद करते हैं. मतलब सारी बातों का लब्बो-लुआब ये है कि कमियाँ ,मीन-मेख निकालने में अपना कोई सानी नहीं है.जिसकी चाहें उसकी बुराई करवा लो और जितनी चाहे उतनी . हम शायद धनात्मक बात करना भूल से गए हैं ...क्या आपको नहीं लगता ?.कम से कम मुझे तो ऐसा लगता है ... वक़्त मुझे गलत साबित करदे तो ख़ुशी होगी !!!!!!!

हम अपनी उन्नति पर गर्व करने कि वजाय उस पर शर्मिंदा होते है . अपनी उन्नति में भी निंदा के कारण आदतन ढूँढ ही लेते हैं कियोंकि ये हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं इसलिए कुछ भी कहीं भी कह सकते हैं . लेकिन यह आदत हमारे ही लिए अच्छी नहीं है कि हम अपनों की गलतियां निकाल कर उसे सार्वजनिक तौर पर नुमाया करें . चाहे बात घर की हो , गली की हो ,शहर की या फिर देश की . बदनामी और कलंक कभी भी नहीं मिटता .हर घटना एक इतिहास बन जाती है और जीवन भर ख़ुद को ही कचोटती रहती है. अपनी ग़ज़ल के दो शेर कहना चाहूँगा इसी विषय के सन्दर्भ में-

"मेरी ख़ामियां न देख ,मुझमे अच्छाइयाँ तलाश
मैं बुरा ही सही ,तू तो अच्छा इंसान बन जा .

तेरा सवाल है ग़र मुझमे कोई अच्छाई नहीं
मुझे शैतान कह दे और ख़ुद भगवान् बन जा.

यह सब बात मैंने इसलिए कही कि पिछले १० महीनो से हम हर चर्चा में एक ही बात पढ़ ,सुन ,देख रहे हैं कि राष्ट्रमंडल खेल देश को शर्मिंदा कर रहे हैं . हमारा विकास नहीं हो पा रहा सही दिशा में ...रिश्वत का बोलवाला है.ख़र्चा कई सो गुना बड़ गया है अपनी निर्धारित धन सीमा से . क्या हम सफल आयोजन कर पायेंगे ? क्या देश कि साख बच जायेगी ? फलां देश के खिलाड़ी ने आने से मना कर दिया ..फलां देश का नुमाइंदा आकर पहले देखेगा कि रिहाइश के कैसे इन्तिजामात हैं ....अरे जिन लोगों कि औकात नहीं है सामने खड़े होने की वो भी सवाल पूछ रहे हैं..जो अपने घर में २ वक़्त की रोटी नहीं ठीक से खा-खिला सकते वो हमारे छप्पन भोग में कमी निकालने लग जाएँ ..सोचो कैसा लगेगा.. और तो और घर का ही अपने कोई सदस्य बताये कि" भैया खीर में गुड कम है "...ख़ुद सोचो कि मन में कैसा तूफ़ान आएगा .दिल कैसा खून के आंसू रोयेगा .....


लेकिन हमारे अपनों की तो हर लीला न्यारी है ...जयचंद न होते तो पृथ्वीराज न मरते. जिस में खाना ..उसी में छेद करना और गुप्त बातों को भी ढिंढोरा पीट -पीट कर बताना अपनी लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा जो ठहरा.
अपने देश को जाने कितने यतन से खेलों के आयोजन का मौका मिला ...लगभग २८ सालों के अंतराल के बाद दिल्ली फिर गौरवान्वित हुई है इस कुम्भ को आयोजित करके.

हमारे देश की जटिल प्रक्रियाओं से गुज़र कर किसी भी समारोह का विश्वस्तरीय आयोजन करना किसी भी भागीरथी प्रयास से हम नहीं हैं ...जहाँ जीने के लिए मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं वहां पर शहर को विश्वस्तरीय रूप देना किसी भी तरह से कमतर नहीं आंका जाना चाहिए. इसके लिए जिनती भी दिल्ली राज्य सरकार ,खेल मंत्रालय ,आयोजन समिति , केंद्र सरकार की प्रशंसा की जाए बहुत की कम है. दिल्ली सरकार की वजीर-ऐ-ख़ास मोहतरमा शीला दीक्षित जी ने जिस दिलेरी और जोश के साथ इस काम को अपने हाथों में लेकर ,जूनून और दानिशमंदी से मुकाम हासिल करवाया है वो वाकई काबिल-ऐ-तारीफ़ हैं .
दिल्ली का ये रूप शायद कितने साल बाद देखने को मिलता ?

सांप निकला ,कुत्ता सोया,हमाम में गंदगी , बिस्तर ठीक नहीं है .....ये सवालात , ये कमियाँ मेरी नज़र में कोई मायने नहीं रखती अगर आप हाथी पालेंगे तो लीद तो होना लाजिम है मेरे भाई .

लेकिन हकीकत तो कुछ और है जो साथ में लगी तस्वीर ख़ुद व ख़ुद कह रहीं हैं .
खेल करने नहीं चाहिए थे .. रिश्वतखोरी हुई है ..करोड़ों का घपला है ,गरीब देश हैं हम ...यह सब फ़िज़ूल की बाते हैं इस समय . मेहमान घर में आये हुए हैं.उनको मेहमान बनकर रहने दो .ख़ुद भी मेजवानी करो .अपनी फटी चादर आपस में बैठ कर सी लेंगे जब मेहमान घर से विदा हो जायेंगे . खूब जूतम-पैजार कर लेंगे लेकिन बाद में. घोड़ों की दौड़ का शौक़ है तो घोड़े पालने भी होंगे ..अस्तबल भी बनाना पड़ेगा ...साईस भी रखना होगा . वरना पैदल ही चलो? कम से कम रौशनी पाने के लिए तेल और बाती जलाने होंगे
........अपने काव्य शब्दों में कहूं तो ----

"सदा बदलाव का दुनिया विरोध करती है
और फिर बाद में उसी पे शोध करती है

उसी लहर ने बढाई है और ज्यादा रवानी
जो पहलोपहल नदिया का प्रतिरोध करती है .

राजनीति भी होती रहेगी . मुद्दे भी उछालते रहेंगे ..बायकाट भी कर देंगे लेकिन बाद में ..अभी तो देश की इज्ज़त का सवाल है ...किसी भी तरह से कम नहीं होनी चाहिए ...बहुत टोपियाँ उछाल लीं .बहुत तमाशे हो गए .बहुत राजनीति हो गई. अब सब बातें भूलनी होंगी.

हमारी दिल्ली का चेहरा ही बदल गया ,किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही है आजकल .खुदा किसी भी बदनुमा दाग से बचाए रखे ...हम सबको अपने देश की लाज रखनी हैं . हमारी सेना,सुरक्षा कर्मी ,सरकारी महकमे सब जी जान से रात -दिन एक किये हुए हैं ..ताकि ये आयोजन सफल हो जाए और हिन्दुस्तान को जल्दी ओलिम्पिक खेलों के आयोजन का जल्दी सुनहरा मौका मिले.

दीपक शर्मा
http://www.kavideepaksharma.com

Saturday, October 2, 2010

स्‍वतंत्र सिनेमा के रास्‍ते के संकट कटने चाहिए : संजय झा

अक्टूबर,१ यमुनानगर। सरकार ऐसी नीति बनाए, जिससे नए फिल्मकार के सामने फंड और प्रोड्यूसर की दिक्कतें खत्म हों और स्वतंत्र सिनेमा को बढ़ावा मिल सके। यह विचार स्ट्रींग्स बाउंड बाई फेथ के निर्माता संजय झा व बिओंड बॉडर्स की निर्मात्री शर्मिला मैती ने प्रेस कांफे्रंस के दौरान पत्रकारों से कहे।

संजय झा ने कहा कि वे लोग भाग्यशाली होते हैं,जिन्हें आसानी से प्रोड्यूसर व फंड मिल जाता है। स्वतंत्र सिनेमा को बढ़ावा मिलने से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में ऐसे लोगों का पदार्पण होगा, जो फिल्म बनाने के इच्छुक हैं। हालांकि आज डिजिटल मीडिया का युग है, जिसमें नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं। अब मोबाइल पर भी फिल्में देखी और बनाई जा सकती है। एक अन्य सवाल के जवाब में झा ने कहा कि बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज जैसे छोटे शहर से होने के बावजूद भी उन्होंने लक्ष्य को नहीं भुलाया है। छोटे शहरों से भी अच्छे फिल्मकार सामने आ रहे हैं जिनके मन में इस विधा के प्रति सच्ची चाहत है अपनी फिल्म के बारे में बतलाते हुए उन्होंने कहा कि मेरी फिल्म एक यात्रा वृतांत है। जिसमें कुंभ मेले के माध्यम से आस्था का पर्व दिखाया है। इस फिल्म की कहानी वारेन हास्टिंग नाम के एक ब्रिटिश युवक की है, जो नासिक मेले में एक पुजारी के घर ठहरता है और पुजारी की बेटी कृष्णा से पे्रम कर बैठता है। फिल्म की कहानी इसी विषय पर केंद्रित हो आगे बढ़ती है। उन्होंने बताया कि २००३ में २० लाख लोगों के बीच जाकर एक महीने में इस फिल्म को फिल्माया गया है। । फिल्म बनाते समय उन्होंने व्यावसायिकता से समझौता नहीं कि और ज्वलंत मुद्दे पर फिल्म बनाई है। यह फिल्म कवि बाबा नागार्जुन को समर्पित है। फिल्म कमर्शियल सिनेमा को छूती है। फिल्म का संगीत आसाम के जुबीन गर्ग का है। इस फिल्म के निर्माता मैथ्यू वर्गीस ने कहा कि रजनल क्षेत्र में बनी फिल्में भी विश्व में ख्याति अर्जित कर रही है। उन्होंने कहा कि कहानी व भाषा में ताकत होनी चाहिए,फिल्म हिट होना लाज़मी है।

फिल्म निर्मात्री शर्मिला मैती ने बताया उनकी फिल्म बिओड बॉडर्स बंगाल व पूर्वी पाक विभाजन पर आधारित है। इस फिल्म में विभाजन के बाद तीन महिलाएं अपनी अनुभवों को बांटती है। हालांकि यह एक डाक्यूमेंट्री फिल्म है,जिसमें गीता घटक व गीता डे मुख्य किरदारों में है। विभाजन का असर औरतों के जीवन पर क्या प्रभाव डालता है, इस बारे में फिल्म में दिखाया गया है।

(साहित्‍यिक-सांस्‍कृति संवाददाता द्वारा यमुनानगर, हरियाणा से पेश रपट )

Friday, October 1, 2010

फिल्‍म उद्योग में हिंदू-मुस्लिमों के बीच भाईचारा कायम है : अडूर गोपालकृष्‍णन

३० सितंबर, यमुनानगर। दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित विश्‍व-प्रख्‍यात फिल्मकार अडूर गोपालकृष्णन ने कहा कि उनके द्वारा निर्देशित फिल्म शैडो किल सत्य घटना पर आधारित है। इस फिल्म में एक जल्लाद की मन:स्थिति को दर्शाया गया है। जिसमें उन्‍होंने एक जल्लाद के इंटरव्यू से प्रेरित होकर फिल्‍म का निर्माण किया। 30 सितम्‍बर की सांय वे डीएवी गर्ल्‍स कालेज, यमुनानगर में आयोजित तीसरे हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्‍म समारोह की पूर्व संध्या पर विशेष प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे।

अपनी फिल्मों के लिए आठ बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाजे गए फिल्‍मकार अडूर का मानना है कि हिंदू मुसलमानों के बीच जितना सौहार्द फिल्म इंडस्ट्री के अंदर है, इतना कहीं पर भी नहीं है। सुप्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार ने मुसलमान होने के बावजूद भी अपना हिंदू नाम रखा , जिससे उन्हें खूब ख्याति मिली। एक प्रश्न के जवाब में अडूर ने कहा कि वे केरल की जिंदगी को मुंबई की भाषा की बनिस्‍वत बेहतर तरीके से जानते हैं। मुंबईया फिल्में भारत की जिंदगी की असलियत नहीं दिखलातीं। फिल्मों में सिर्फ भाषा ही नहीं, अपितु ऐसी बहुत सी चीजें होती हैं, जिन्हें समझने की जरुरत है। उन्होंने बतलाया कि कोई निर्माता स्थानीय होने के बाद ही यूनिवर्सल बनने की ओर कदम बढ़ाता है, जिसके जीवंत उदाहरण सत्यजीत राय व श्याम बेनेगल हैं। ऑस्कर अवार्ड से कान, वेनिस व बर्लिन फिल्म समारोह में मिलने पुरस्कारों को बड़ा बतलाते हुए उन्‍होंने कहा कि ऑस्‍कर सिर्फ अमेरिकन फिल्म इंडस्ट्री की देन है। अडूर ने छोटे फिल्‍म समारोहों की उपयोगिता को सार्थक बतलाते हुए जोड़ा कि बड़े व छोटे फिल्मोत्सव दोनों ही समान रुप से महत्वपूर्ण होते हैं। छोटे फिल्मोत्सव में फिल्मों के शिल्प व शैली की ओर सदैव अधिक ध्यान दिया जाता है और बड़े उत्सवों में ग्लैमर और चकाचौंध पर फोकस किया जाता है। फिल्मकार को हमेशा असलियत ही दिखानी चाहिए और किसी को भी इसमें शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। यह लोगों की गलत धारणा है कि कला फिल्में पैसा नहीं कमातीं। इसकी मिसाल उन्होंने सत्यजीत राय की उन फिल्मों से दी, जिन्होंने लागत से अधिक पैसा कमाने का रिकार्ड कायम किया है। प्रेस कांफ्रेंस के दौरान फिल्मकार के. बिक्रम सिंह ने कहा कि आजादी के 60 साल बीत जाने के बाद भी देश में ४० प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिलती। जबकि हम कॉमनवेल्थ गेम्स पर ७० हजार करोड़ रुपए खर्च करने के लिए तैयार हैं।

अडूर की फीचर फिल्मों की स्क्रिप्ट पुस्‍तक रूप में प्रकाशित हो रही हैं

प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अडूर गोपालकृष्णन ने बताया कि उन्होंने जितनी भी फीचर फिल्में बनाई हैं, उनकी फिल्म ट्रांसक्राइब करके स्क्रिप्ट तैयार की जा रही है। यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित की जा रही है।
(साहित्‍यिक-सांस्‍कृति संवाददाता द्वारा यमुनानगर, हरियाणा से पेश रपट )

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण