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Monday, December 27, 2010

अज्ञेय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित






नई दिल्ली. दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कालेज में अज्ञेय की जन्म शताब्दी के अवसर पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से 'आज के प्रश्न और अज्ञेय' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस दो दिवसीय आयोजन में अनेक महविद्यालयों के अध्यापकों, शोधार्थियों और युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की. उदघाटन समारोह में सुविख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि शब्दों का वैभव अज्ञेय के पूरे कविता संसार में देखा जा सकता है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. उन्होंने कहा कि अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. प्रो. सिंह ने अज्ञेय की चर्चित कविताओं 'नाच' और 'असाध्य वीणा' को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय के काव्य के सभी कला रूपों का दर्शन 'नाच' में होता है. प्रथम सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने कहा कि हमारा समय मध्य वर्ग को गोदाम बनाने का युग है जहां दुनिया को विचार के बदले वस्तुओं से बदल देने पर जोर है.

उन्होंने कहा कि इस सन्दर्भ में अज्ञेय का रचना कर्म महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे विचार पर पूरा आग्रह करते हैं. वाजपेयी ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे खड़ी बोली के सबसे बड़े बौद्ध कवि हैं जो शान्ति और स्वाधीनता का संसार रचते हैं. उन्होंने कहा कि परम्परा से हमारे यहाँ साहित्य और कला चिंतन साझा रहा है लेकिन हिंदी आलोचना दुर्भाग्य से साहित्य तक सीमित रही है. इस सन्दर्भ में अज्ञेय के चिंतन को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया. वरिष्ट समालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सभ्यता ऐसे बिंदु पर पहुँच गई है जहां पूंजीवाद और प्रकृति में एक को चुनना पड़ेगा और तब हम देखेंगे कि अज्ञेय की कविता अंततः पूंजी के नहीं, प्रकृति और मनुष्यता के पक्ष में जाती है.प्रो. तिवारी ने कहा कि अज्ञेय में दार्शनिक विकलता का चरम रूप असाध्य वीणा में है,जो ध्यानात्मक होती चली गई है.अज्ञेय की कुछ बहुत छोटी-छोटी कविताओं की चर्चा करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि बड़े संकट में छोटी चीज़ें भी अर्थवान हो जाती हैं, ये इसका उदाहरण है. इससे पहले हिन्दू कालेज के प्राचार्य प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव ने स्वागत किया और संयोजक डॉ. विजया सती ने संगोष्ठी की रूपरेखा रखी. सत्र का संयोजन कर रहीं डॉ. रचना सिंह ने वक्ताओं का परिचय दिया. दूसरे सत्र में विख्यात कवि और अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरे सप्तक के रचनाकार प्रो. केदारनाथ सिंह ने कहा कि मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है. उन्होंने कहा कि अज्ञेय की कविता पाठक और अपने बीच एक ओट खडा करती है और यह उनकी कविता की ख़ास तिर्यक पद्धति है. 'भग्नदूत' और 'इत्यअलम' जैसे उनके प्रारंभिक संकलनों को पुनर्पाठ के लिए जरूरी बताते हुए केदारजी ने कहा कि बड़ी कविता में वे रेहटरिक हो जाते थे वहीं छोटी कविताओं में उनकी पूरी रचनात्मक शक्ति और सामर्थ्य दिखाई पड़ती है. वैविध्य की दृष्टि से अज्ञेय को उन्होंने हिंदी के थोड़े से कवियों में बताया.


केदारनाथ जी ने कहा कि अज्ञेय कविता के बहुत बड़े अनुवादक भी हैं. 'आधुनिक भावबोध और अज्ञेय की कविता' विषयक इस सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और सुपरिचित आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह ने शीतयुद्ध के दौर में हिन्दी आलोचना के सन्दर्भ में अज्ञेय के कृतित्व पर विचार करते हुए कहा कि भारतीय कविता श्रव्य परम्परा की रही है जिसे आधुनिक बनाने की कोशिश अज्ञेय ने की. प्रो. सिंह ने कहा कि इसी दौर में लघुमानव और महामानव की बहस में साहित्य को लघु मानव अर्थात सामान्य मनुष्य की ओर मोड़ने के लिए भी अज्ञेय को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिनका मनुष्य की गरिमा में गहरा विश्वास है. उन्होंने कहा कि जिस यथार्थवाद की कसौटी पर अज्ञेय को खारिज किया जाता है वह ढीली ढाली है अतः कविता के इतिहास पर दुबारा बात की जानी चाहिए. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के प्रो. गोबिंद प्रसाद ने कहा कि अज्ञेय बेहद आत्मसज़गता के कवि थे, जो ताउम्र अपनी छाया को ही लांघते रहे, अपने से लड़ते रहे. उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने आधुनिकता को एक निरंतर संस्कारवान होने की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा है, जहां स्व और आत्म पर बेहद आग्रह है. प्रो. प्रसाद ने कहा कि इसका एक सिरा जहां अस्मिता और इयत्ता से जुड़ता है वहीं दूसरा आत्मदान और दाता भाव से भी. कवि और कविता की रचना प्रक्रिया पर जितनी कवितायें अज्ञेय ने लिखी हैं उतनी और किसी हिन्दी कवि ने नहीं. इस सत्र का संयोजन विभाग के अध्यापक डॉ. पल्लव ने किया. दूसरे दिन सुबह पहले सत्र में पटना विश्वविद्यालय में आचार्य रहे आलोचक प्रो. गोपाल राय 'शेखर एक जीवनी' पर अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि बालक के विद्रोही बनने की प्रक्रिया में अज्ञेय ने गहरी अंतरदृष्टि और मनोवैज्ञानिकता का परिचय दिया है, वहीं प्रेम के प्रसंग में भी उनका वर्णन और भाषाई कौशल अद्भुत है. उन्होंने विद्रोह, क्रान्ति और आतंक में भेद बताते हुए कहा की यदि इस उपन्यास का तीसरा भाग आ पता तो शेखर के विद्रोह का सही चित्र देखना संभव होता, उपलब्ध सामग्री में विद्रोह कर्मशीलता में परिणत नहीं हो पाया है.


कथाकार और जामिया मिलिया के हिंदी आचार्य प्रो. अब्दुल बिस्मिलाह ने अज्ञेय की कहानियों पर अपने व्याख्यान में श्रोताओं का ध्यान कई नए बिन्दुओं की ओर आकृष्ट किया. उन्होंने आदम-हव्वा की प्राचीन कथा का सन्दर्भ देते हुए कहा कि सांप मनुष्य को विद्रोह के लिए उकसाने वाला जीव है और अज्ञेय की कहानियों में सांप की बार बार उपस्थिति अकारण नहीं है. प्रो. बिस्मिल्लाह ने कहा कि विभाजन और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में लिखी गई अज्ञेय की कहानियां अब और अधिक महत्वपूर्ण और प्रसंगवान हो गई हैं. उन्होंने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में विद्रोह वही नहीं है जो दिखाई दे रहा है अपितु भीतर भीतर पल रहा विद्रोह कम नहीं है.

आलोचक और हिन्दू कालेज में सह आचार्य डॉ. रामेश्वर राय ने कहा कि अज्ञेय के लिए व्यक्ति मनुष्य की सत्ता उसकी विचार क्षमता पर निर्भर करती है और उनके लिए विचार होने की पहली शर्त अकेले होने का सहस है.डॉ. राय ने इश्वर,विवाह और नैतिकता के सम्बन्ध में अज्ञेय के चिंतन पर चर्चा करते हुए कहा कि उनके यहाँ विद्रोह जंगल हो जाने की आकांक्षा है जिसके नियम इतने सर्जनात्मक हैं कि व्यक्ति के विकास में कोई दमन न हो. समापन समारोह में वरिष्ट आलोचक एवं दिल्ली विश्व विद्यालय की पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि अज्ञेय को कविता में किसी भी वस्तु या विषय के ब्रांडधर्मी उपयोग पर आपत्ति थी और उनके लिए कविता तथा जीवन का यथार्थ एक ही नहीं था. उन्होंने कहा कि व्यक्ति की अद्वितीयता में अज्ञेय की आस्था अडिग है और वे इतनी दूर तक ही 'मैं' को समाज के लिए अर्पित करने को प्रस्तुत हैं कि उनका अस्तित्व बना रहे. प्रो. जैन ने अज्ञेय की चर्चित कविता 'नदी के द्वीप' को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय अपने चिंतन को कविता के रूप में बयान करते हैं.उन्होंने शताब्दी वर्ष में केवल रचनाकार के गुणगान तक सीमित रह जाने के खतरे से आगाह करते हुए कहा कि क्लिशे में जाने कि बजाय पलट पलट कर देखना होगा कि दूसरी आवाजें तो नहीं आ रहीं हैं. समापन सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी प्रयाग शुक्ल ने कहा कि अज्ञेय सोचते हुए लेखक कवि हैंजो आधुनिक बोध को लाये. उन्होंने कहा कि हिन्दी को अज्ञेय की जरूरत थी. शुक्ल ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे भाषा के सावधान प्रयोग के लिए याद किये जायेंगे. उन्होंने अज्ञेय से जुड़े अपने कई संस्मरण भी सुनाये. वरिष्ट कथाकार राजी सेठ ने इस सत्र में अज्ञेय के चिंतन पक्ष पर विस्तार से विचार करते हुए कहा कि उनका चिंतन कर्म और काव्य कर्म वस्तुतः अलग नहीं है .लेकिन यहाँ समस्या होती है कि क्या अज्ञेय की कविता उनके चिंतन की अनुचर है? आयोजन स्थल पर अज्ञेय साहित्य और अज्ञेय काव्य के पोस्टर की प्रदर्शनी को भरपूर सराहना मिली. आयोजन में अंग्रेजी समालोचक प्रो. हरीश त्रिवेदी, कवि अजित कुमार,युवा आलोचक वैभव सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रोताओं ने भाग लिया।


(दिल्ली से सांस्कृतिक संवाददाता की रिपोर्ट )

Sunday, December 19, 2010

पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत करने हेतु आगे आएं

पर्यावरण, ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य उपहार है जो संपूर्ण मानव समाज का एकमात्र महत्वपूर्ण और अभिन्न अंग है। प्रकृति द्वारा प्रदत्त अमूल्य भौतिक तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु एवं अग्नि से मिलकर पर्यावरण का निर्माण हुआ हैं। इसे सुरक्षित और संरक्षित रखना हमारा परम कर्त्तव्य है । हमारे एक सम्मानित ब्लोगर बन्धु शिवम् मिश्रा ने सामूहिक पहल की है इस दिशा में ......तो आईये पर्यावरण की सुरक्षा के दृष्टिगत चेतना जागृत करने हेतु चलाये जा रहे इस अभियान में हम सभी शामिल होते हैं ।
() रवीन्द्र प्रभात

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प्रिय मित्र,

ब्लॉग जगत में एक आलेख प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है । हमारा उद्देश्य पर्यावरण के प्रति चेतना जागृति करना है। आज पर्यावरण की हानि होने से ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या से पूरी दुनिया को जुझना पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान सामने आ रहे हैं। हम पर्यावरण की रक्षा करें एवं आने वाली पी्ढी के लिए स्वच्छ वातावरण का निर्माण करें। प्रतियोगिता में सम्मिलित होने के लिए सूचना एवं नियम इस प्रकार है।
विषय -- "बचपन और हमारा पर्यावरण"
प्रथम पुरस्कार
11000/= (ग्यारह हजार रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र
द्वितीय पुरस्कार
5100/= (इक्यावन सौ रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र
तृती्य पुरस्कार
2100/= (इक्की्स सौ रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र
सांत्वना पुरस्कार (10)
501/=(पाँच सौ एक रुपए नगद)
एवं प्रमाण-पत्र
1. इस प्रतियोगिता में 1 नवम्बर 2010 से 14 जनवरी 2011 तक आलेख भेजे जा सकते है।
2. प्रतियोगिता में सिर्फ़ दिए गए विषय पर ही आलेख सम्मिलित किए जाएंगे।
3. एक रचनाकार अपने अधिकतम 3 अप्रकाशित मौलिक आलेख भेज सकता है पुरस्कृत होने की स्थिति में वह केवल एक ही पुरस्कार का हकदार होगा।
4. स्व रचित आलेख 1 नवम्बर 2010 से 14 जनवरी 2011 तक lekhcontest@gmail.com पर भेज सकते हैं। कृपया साथ में मौलिकता का प्रमाण-पत्र एवं अपना एक अधिकतम १०० शब्दों में परिचय तथा तस्वीर भी संलग्न करें। नियमावली की कंडिका 7 से संबंध नहीं होने का का भी उल्लेख प्रमाण-पत्र में करें। आलेख कम से कम 500 एवं अधिकतम 1000 शब्दों में होने चाहिए।
आपसे निवेदन है कि प्रत्येक रचना को अलग अलग इमेल से भेजने की कृपा करें. यानि एक इमेल से एक बार मे एक ही रचना भेजे.
5. हमें प्राप्त रचनाओं मे से जो भी रचना प्रतियोगिता में शामिल होने लायक पायी जायेगी उसे हमारे सहयोगी ब्लाग "हमारा पर्यावरण" पर प्रकाशित कर दिया जायेगा, जो इस बात की सूचना होगी कि प्रकाशित रचना प्रतियोगिता में शामिल कर ली गई है।
6. 15 जनवरी 2011 से प्रतियोगिता में सम्मिलित आलेखों का प्रकाशन "हमारा पर्यावरण" पर प्रारंभ कर दिया जायेगा.
7. इस प्रतियोगिता में हमारा पर्यावरण, एसार्ड, एवं पर्यावरण मंत्रालय से संबंधित कोई भी व्यक्ति या उसका करीबी रिश्तेदार भाग लेने की पात्रता नहीं रखता।
8. इन रचनाओं पर "हमारा पर्यावरण" का कापीराईट रहेगा. और कहीं भी उपयोग और प्रकाशन का अधिकार हमें होगा.
9. रचनाओं को पुरस्कृत करने का अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ "हमारा पर्यावरण" के संचालकों के पास सुरक्षित रहेगा. इस विषय मे किसी प्रकार का कोई पत्र व्यवहार नही किया जायेगा और ना ही किसी को कोई जवाब दिया जायेगा.
10. इस प्रतियोगिता के समस्त अधिकार और निर्णय के अधिकार सिर्फ़ "हमारा पर्यावरण" के पास सुरक्षित हैं. प्रतियोगिता के नियम किसी भी स्तर पर परिवर्तनीय है.
11.पुरस्कार IASRD द्वारा प्रायोजित हैं.
12. यह प्रतियोगिता पर्यावरण के प्रति जागरुकता लाने के लिए एवं हिंदी मे स्वस्थ लेखन को बढावा देने के उद्देश्य से आयोजित की गई है.
(नोट:-प्रतियोगिता में ब्लॉग जगत के अलावा अन्य भी भाग ले सकते हैं प्रतियोगी की आयु 18 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए)आपको सूचित इस लिए कर रहा हूँ क्यों कि मैं चाहता हूँ आप इस प्रतियोगिता में भाग लें और अपने आलेख जरूर भेजें ! आशा है आप मेरी विनती पर जरूर गौर करेंगे !

सादर आपका-

शिवम् मिश्रा
http://burabhala.blogspot.com/

Monday, December 13, 2010

अविनाश वाचस्‍पति को सूचना और प्रसारण मंत्रालय का हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मान

प्रख्‍यात हिन्‍दी व्‍यंग्‍यकार और साहित्‍यकार-ब्‍लॉगर अविनाश वाचस्‍पति को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मान से सम्‍मानित करने का निर्णय लिया है। अविनाश वाचस्‍पति को यह सम्‍मान राजभाषा पुरस्‍कार वितरण समारोह में माननीय सचिव प्रदान करेंगे। उन्‍हें यह सम्‍मान हिन्‍दी साहित्‍य के क्षेत्र में किए जा रहे योगदान के लिए दिया जा रहा है। पत्र सूचना कार्यालय के शास्‍त्री भवन, नई दिल्‍ली में स्थित सम्‍मेलन कक्ष में वर्ष 2008 - 2009 के लिए पुरस्‍कारों का वितरण बुधवार दिनांक 15 दिसम्‍बर 2010 को किया जायेगा। अंतर्जाल पर हिन्‍दी के लिए किया गया उनका कार्य किसी परिचय का मोहताज नहीं है। अविनाश जी साहित्य शिल्पी से भी लम्बे समय से जुडे हुए हैं इसके अलावा सामूहिक वेबसाइट नुक्‍कड़ के मॉडरेटर हैं, जिससे विश्‍वभर के एक सौ प्रतिष्ठित हिन्‍दी लेखक जुड़े हुए हैं। इसके अतिरिक्‍त उनके ब्‍लॉग पिताजी, बगीची, झकाझक टाइम्‍स, तेताला अंतर्जाल जगत में अपनी विशिष्‍ट पहचान रखते हैं।
उन्‍हें देश भर में नेशनल और इंटरनेशनल ब्‍लॉगर सम्‍मेलन आयोजन कराने का श्रेय दिया जाता है। मुंबई, दिल्‍ली, जयपुर, आगरा इत्‍यादि शहरों में कराए गए उनके आयोजन अविस्‍मरणीय और हिन्‍दी के प्रचार/प्रसार में सहायक बने हैं। इंटरनेट पर हिन्‍दी के उनके निस्‍वार्थ सेवाभाव के कारण विश्‍वभर में उनके करोड़ों प्रशसक मौजूद हैं।भारतीय जन संचार संस्थान से 'संचार परिचय', तथा ‘हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम’ में प्रशिक्षण लिया है। व्यंग्य, कविता एवं फ़िल्म लेखन उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ हैं। सैंकड़ों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। जिनमें नवभारत टाइम्‍स, हिन्‍दुस्‍तान, जनसत्‍ता, भास्‍कर, नई दुनिया, राष्‍ट्रीय सहारा, अमर उजाला, सन्‍मार्ग, हरिभूमि, अहा जिंदगी, स्‍क्रीनवर्ल्‍ड, मिलाप, वीर अर्जुन, डीएलए, साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान, व्‍यंग्‍ययात्रा, आई नैक्‍स्‍ट, गगनांचल इत्‍यादि और जयपुर की अहा जिंदगी मासिक उल्‍लेखनीय हैं।
सोपानस्‍टेप मासिक और डीएलए दैनिक में नियमित रूप से व्‍यंग्‍य स्‍तंभ लिख रहे हैं। वर्ष 2008, 2009 और वर्ष 2010 में यमुनानगर, हरियाणा में आयोजित हरियाणा अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोहों में फिल्‍मोत्‍सव समाचार का तकनीकी संपादन किया है। हरियाणवी फ़ीचर फ़िल्मों 'गुलाबो', 'छोटी साली' और 'ज़र, जोरू और ज़मीन' में प्रचार और जन-संपर्क तथा नेत्रदान पर बनी हिंदी टेली फ़िल्म 'ज्योति संकल्प' में सहायक निर्देशन किया है। राष्ट्रभाषा नव-साहित्यकार परिषद और हरियाणवी फ़िल्म विकास परिषद के संस्थापकों में से एक। सामयिक साहित्यकार संगठन, दिल्ली तथा साहित्य कला भारती, दिल्ली में उपाध्यक्ष। केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद के आजीवन सदस्‍य। 'साहित्यालंकार' , 'साहित्य दीप' उपाधियों और राष्ट्रीय हिंदी सेवी सहस्त्राब्दी सम्मान' तथा ‘कविता शिल्‍पी पुरस्‍कार’ से सम्मानित। 'शहर में हैं सभी अंधे' स्‍वरचित काव्‍य रचनाओं का संकलन हिन्‍दी अकादमी, दिल्‍ली के सौजन्‍य से प्रकाशित हुआ है। काव्य संकलन 'तेताला' तथा 'नवें दशक के प्रगतिशील कवि’ कविता संकलन का संपादन किया है।

उन्‍हें वर्ष 2009 के लिए हास्‍य-व्‍यंग्‍य श्रेणी में ‘संवाद सम्‍मान’ भी दिया गया है। ‘लोकसंघर्ष परिकल्‍पना सम्‍मान’ के अंतर्गत 2010 में वर्ष के ‘श्रेष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार सम्‍मान’ अगले वर्ष लखनऊ में आयोजित एक भव्‍य समारोह में प्रदान किया जाएगा।
(दिल्ली से सांस्कृतिक प्रतिनिधि की रिपोर्ट )

Thursday, December 9, 2010

रघुनाथ सहाय व सुधीर गुप्ता को मिला द्वितीय मिथलेश-रामेश्वर स्मृति प्रतिभा सम्मान- 2010

झाँसी। विगत दिनों झाँसी में चित्रांश ज्योति पत्रिका परिवार की ओर से दो सत्रों में आयोजित समारोह में समाज की अनेक प्रतिभाओं को समारोह के मुख्य अतिथि श्री प्रदीप जैन आदित्य (केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री) एवं विशिष्ट अतिथि स्थानीय विधायक श्री कैलाश साहू ने सम्मानित किया। सम्मान समारोह में बोलते हुए श्री जैन ने जहाँ सही मार्गदर्शन एवं प्रगति के लिए साहित्य व कला की उचित भूमिका के निर्वहन को ज़रूरी बताया और कहा कि साहित्यकार व कलाकार ही समाज को नई दिशा प्रदान कर सकते हैं वहीं श्री साहू ने चित्रांश परिवार के अनेक वर्षों से समाज को एकजुट किए जाने वाले कार्यों की प्रशंसा की और स्थानीय व बाहर से आए साहित्यकारों व कलाकारों के देश व समाज के प्रति किए जा रहे कार्यों की सराहना की।

इस अवसर पर दिल्ली से प्रकाशित चित्रांश परिवार की सहयोगी पत्रिका हम सब साथ साथ साथ की ओर से साहित्य/कला के क्षेत्र की उत्कृष्ट प्रतिभाओं के लिए प्रतिवर्ष दिये जाने वाले मिथलेश-रामेश्वर स्मृति प्रतिभा सम्मान पत्रिका के कार्यकारी संपादक श्री किशोर श्रीवास्तव के सौजन्य से बहुमुखी प्रतिभा के धनी कोटा के वरिष्ठ साहित्यकार श्री रघुनाथ सहाय मिश्र एवं झाँसी के युवा साहित्यकार श्री सुधीर गुप्ता ‘चक्र’ को प्रदान किया गया।

समारोह के प्रारम्भ में माननीय मंत्री महोदय ने भगवान श्री चित्रगुप्त जी के चित्र पर पुष्प चढ़ाकर एवं दीप जलाकर समारोह का विधिवत उद्घाटन किया एवं त्पश्चात बच्चों ने चित्रगुप्त वंदना प्रस्तुत की। समारोह के दूसरे सत्र में अनेक बच्चों ने गीत, नृत्य एवं चित्रकला आदि की विभिन्न प्रतियोगिताओं के माध्यम से पनी कला का प्रदर्शन कर पुरस्कार जीते। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी कायस्थ समाज की वरिष्ठ प्रतिभाओं के साथ ही मेधावी छात्र-छात्राओं को भी सम्मानित किया गया।

समारोह का संचालन संयुक्त रूप से श्रीमती मधु श्रीवास्तव व मुकेश बच्चन ने किया। आभार प्रदर्शन पत्रिका की संपादक श्रीमती विजय लक्ष्मी श्रीवास्तव एवं अरुण श्रीवास्तव ने किया।

(झांसी से लाल बिहारी लाल की रिपोर्ट )

Saturday, December 4, 2010

प्रसिद्ध पटना पुस्तक मेला १० दिसंबर से


(पटना) प्रसिद्ध पटना पुस्तक मेला 2010 के लिए अब पुस्तक प्रेमियों, बुद्धिजीवियों और हजारों हजार छात्रों के इंतज़ार की घड़ी समाप्त हो गई। बहुप्रतीक्षित पटना पुस्तकमेला 10 दिसंबर से 21 दिसंबर तक गांधी मैदान में आयोजित होने जा रहा है। ऐतिहासिक गाँधी मैदान में मेले की तैयारी पूरे जोरों से की जा रही हैं। मेले में बड़ी संख्या में प्रकाशक भाग ले रहे हैं जिनमें बहुत तो पहली बार मेले में शामिल होने आ रहे। जिन्हों ने अपनी प्रतिभागिता सुनिष्चित करवा ली है उनमें - ईन्टरनेषनल बुक हाउस प्राइवेट लिमिटेड, मुम्बई, वीवा बुक्स प्राइवेट लिमिटेड,वाईली इन्टरनेशल, जयपी ब्रदर्स मेडिकल पब्लिशर्स।


मेकमिलन इंडिया लिमिटेड,पीयर्सन, प्रेन्टिसहॉल ऑफ़ इंडिया नारोसा बुक्स डिस्ट्रीब्युटर्स आदि का नाम प्रमुख है। इसके अतिरिक्त, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, पेंगुइन, पुस्तक महल, साहित्य भवन, प्रभात प्रकाशन, राजकमल आदि तो नियमित प्रतिभागियों में से हैं। कुल मिला कर इस बार 250 से अधिक प्रकाशकों और पुस्तक विक्रेता मेला में भाग ले रहे हैं और लगभग 800 (आठसौ) से अधिक स्टालों का निर्माण किया जा रहा है। उद्घाटन के लिए बिहार के महामहिम राज्यपाल से अनुरोध किया गया है। जबकि नालंदा ओपन युनिवर्सिटी के कुलपति श्री जितेन्द्र सिंह जी मुख्य अतिथि होंगे। पिछले वर्षों की तरह, स्कूली बच्चों के लिए मेला में निःशुल्क प्रवेष की व्यवस्था की गई है। विश्वविद्यालय एवं कॉलेज के छात्रों के प्रवेश उनके कॉलेज पहचान पत्र के आधार पर होगा। पुस्तक प्रेमियों की सुविधा के लिए शहर के विभिन्न प्रमुख स्थलों, दुकानों में अलग से टिकट उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही हैं।

हज़ार से भी अधिक गेट पास विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं को भेजा जा रहा है। मेले में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था कायम करने की दृष्टि से अधिक से अधिक सुरक्षा बलों की तैनाती की जा रही हैं। पुलिस की मदद के अतिरिक्त निजी एजेंसी के भी अनेक दक्ष गार्ड सुरक्षा व्यवस्था में लगाए जा रहे हैं। मेले का समय 12.00 बजे दोपहर से 8.00 संध्या तक रहेगा। रविवार और छुट्टियों के दिन मेला 11.00 बजे पूर्वाह्न से 8.30 बजे संध्या तक रहेगा।

धूल पर काबू पाने के लिए मेला परिसर में नियमित रूप से पानी के छिड़काव की व्यवस्था की जा रही है। बुजुर्ग लोगों की सुविधा के लिए परिसर में पर्याप्त बेंच की व्यवस्था की जा रही है ताकि उनको बैठने में असुविधा न हो । विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावे मेला में सेमिनार, वादविवाद प्रतियोगिता, क्विज का भी आयोजन नियमित रूप से किया जा रहा है।

मेले में अनेक नव प्रकाशित पुस्तकों का लोकार्पण भी किया जाएगा जिसके लिए लेखकों, प्रकाशकों का अनुरोध मेला समिति में पहले से ही किया जा चुका है।

पुस्तक मेला में सर्वश्रेष्ठ स्टाल, सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए तथा पुस्तकों का सबसे अच्छा रेंज, के लिए प्रतिभागियों को सम्मानित किया जाएगा।

पुस्तक मेले के दौरान कुछ प्रमुख कार्यक्रमों में से कुछ इस प्रकार हैं-

उनकी कहानी मेरी जुबानी: इस कार्यक्रम के तहत कहानी पाठ के लिए उपयुक्त तथा अच्छे वक्तृत्व कौशल के व्यक्तियों को आमंत्रित किया जाएगा जिनके द्वारा कालजयी कथाकारों की प्रसिद्ध कहानियों का पाठ किया जएगा।

उनका काव्य मेरी वाणीः इस कार्यक्रम के तहत प्रसिद्ध कवियों की कविताओं का पाठ कलात्मक अभिव्यक्ति के साथ दक्ष व्यक्तियों के द्वारा किया जाएगा।

मीडिया लीडरः इस कार्यक्रम में कुछ प्रसिद्ध मीडिया हस्तियों को आम जन के साथ संवाद स्थापित करने के लिए आमंत्रित किया जाएगा। मीडिया से जुड़े कुछ प्रसिद्ध नाम जो कार्यक्रम को संबोधित करेंगे तथा लोगों से संवाद करेंगे उनके नाम इस प्रकार है- अजीत अंजुम (न्युज 24), श्रवण गर्ग, मुख्य संपादक दैनिक भास्कर, आशुतोष, प्रबंध संपादक आईबीएन 7. इनके अतिरिक्त और कुछ प्रमुख व्यक्तियों से सम्पर्क किया जा रहा है।

नुक्कड़ नाटकः नियमित रूप से पूर्व की भाँति मेला परिसर में आयोजित किया जाएगा।

जनसंवादः इस कार्यक्रम में जीवन के अलग-अलग क्षेत्र के प्रख्यात लोगों के साथ अपनी प्रसिद्धि,सफलता के संबंध में आम लोगों की बातचीत होगी।

कलादीर्घाः कलात्मक कृतियों का प्रदर्शन।

पुस्तक व्यसनीः इस कार्यक्रम के तहत ऐसे व्यक्तित्व के साथ आम लोगों, पाठकों की बातचीत होगी जो ज़रूरी नहीं कि साहित्य अथवा शिक्षण से ही जुड़े हो अपितु जीवन के विभिन्न क्षेत्रों यथा राजनीति, नौकरशाही, व्यवसाय, बैंकिंग आदि में रहते हुए भी अध्ययन और पुस्तकों के साथ अपना सरोकार आजीवन बनाए रखा है। लोग उनसे उनकी पढ़ने की आदतों के बारे में, उनकी अभिरुचियों के बारे में बातचीत करेंगे साथ ही पटना पुस्तक मेले में पुस्तकों की उपलब्धता बढ़ाने, मेले को और आकर्षक बनाने केलिए क्या करना चाहिए? इसके संबंध में भी वे अपने विचार देंगे।

एजुकेशन फ़िएस्टाः इसके तहत अंतर स्कूल, कॉलेज प्रतियोगिता का कार्यक्रम होगा जिसमें क्विज, वादविवाद आदि का आयोजन किया जएगा।

बाइस्कोपः इस कार्यक्रम में इस वर्ष के प्रसिद्ध सिनेमा निर्माता बिहार के लोकप्रिय निर्माता एवं निर्देषक प्रकाश झा के द्वारा बनाई गई फ़िल्मों का स्क्रीन किया जाएगा। जिसमें दामूल, हिप हिप हुर्रे, राजनीति, अपहरण, गंगाजल, मृत्युदंड, आदि का प्रदर्शन किया जाएगा।

.पत्रकार सम्मेलन में अमित झा, संयोजक, एच एल गुलाटी, अध्यक्ष, ए के झा सचिव, एन.के झा, डा. कलानाथ मिश्र, सांस्कृतिक सचिव, रतनेष्वर, मीडिया प्रभारी ने यह भी जानकारी दी है कि पुस्तक मेला में पत्रकारिता, नाटक और साहित्य के लिए पुरस्कार भी दिया जाएगा। पूर्व के वर्षों की तरह ही पुस्तक मेला के सांस्कृतिक सचिव डॉ. कलानाथ मिश्र, पुस्तक मेला के कार्यक्रमों का संचालन करेंगे जबकि श्री एन.के. झा, कार्यकारी निदेशक, मेला के समग मार्गदर्शक की भूमिका में रहेंगे।
(कलानाथ मिश्र की रिपोर्ट )

Wednesday, December 1, 2010

राजेन्द्र मिश्र व जयप्रकाश को गजानन माधव मुक्ति बोध सम्मान

रायपुर । महाराष्ट्र मंडल ने गुरुवार 25 नवंबर को आलोचक द्वय राजेन्द्र मिश्र व जयप्रकाश को गजानन माधव मुक्ति बोध सम्मान से नवाज़ा। उन्हें पुरस्कार स्वरूप 11 हज़ार रुपए नकद, शॉल, श्रीफल, हिंदी -मराठी में प्रशस्ति पत्र व स्मृति चिह्न प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्हें वर्ष 2009 व 2010 के लिए दिया गया। इनका चयन विनोदकुमार शुक्ल, डॉ. आलोक वर्मा तथा कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति सच्चिदानंद जोशी ने किया था।

रायपुर के संत ज्ञानेश्वर सभागार में आयोजित इस समारोह के मुख्य अतिथि नागपुर के वरिष्ठ साहित्यकार श्रीपाद भालचंद्र जोशी थे। उन्होंने "आतंकवाद का माध्यम और माध्यमों का आतंकवाद" पर बोलते हुए कहा कि माध्यम गेटकीपर से बनकर घर मालिक बन चुका है। यह इच्छित विचार को लादने का षडयंत्र है। हमें क्या देखना, क्या खाना है, क्या सुनना और पहनना है यह माध्यम ही तय करता है। श्री जोशी ने कहा कि मित्रों की हिंसा को अहिंसा माने और जो दुश्मन है उसे किसी भी माध्यम से कुचलने में बुराई नहीं है।

.कार्यक्रम के संयोजक अरुण काठोटे और रविन्द्र ठेंगड़ी ने बताया कि मुक्तिबोध सम्मान प्रदेश के साहित्यकारों के लिए 1999 से शुरू किया गया है। अब तक इस सम्मान से नारायणलाल परमार, श्यामलाल चतुर्वेदी, रमाकांत श्रीवास्तव, प्रभाकर चौबे, कुंतल गोयल तथा देवीसिंह चौहान को सम्मानित किया गया है। पिछले वर्ष पुरस्कार नहीं दिया गया था, इसलिए इस बार एक साथ दो साहित्कारों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन दिव्या चतुर्वेदी ने किया। इस मौक़े पर कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विवि के कुलपति सच्चिदानंद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैय्यर और महाराष्ट्र मंडल परिवार के सदस्य उपस्थित थे।

(रायपुर से रिपोर्ट )

ये हैं हमारे प्रथम परिकल्पना सम्मान-२०१० के सम्मानित सदस्यगण